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प्रतीक यादव की मौत ने फिर खोले समाजवादी पार्टी के पारिवारिक राजनीति वाले ज़ख्म

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प्रतीक यादव की मौत ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवादी पार्टी के अंदरूनी पारिवारिक विवादों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक लखनऊ में 38 साल की उम्र में प्रतीक यादव का निधन हो गया। हालांकि वे सीधे तौर पर सक्रिय राजनीति में नहीं थे, लेकिन उनकी पहचान एक बिजनेसमैन, फिटनेस प्रेमी और लग्जरी लाइफस्टाइल वाले व्यक्ति के रूप में थी।

प्रतीक यादव की पहचान सिर्फ एक कारोबारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे मुलायम सिंह यादव के दूसरे परिवार से जुड़े होने के कारण हमेशा राजनीतिक चर्चाओं में बने रहे। उनकी मां साधना गुप्ता थीं, जिनके साथ मुलायम सिंह का रिश्ता लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। इसी वजह से यादव परिवार के भीतर “पहला परिवार” और “दूसरा परिवार” की चर्चा कई वर्षों तक चलती रही।

समाजवादी पार्टी की कहानी भी यहां सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी की नहीं रह जाती, बल्कि एक पारिवारिक सत्ता संघर्ष की कहानी बन जाती है। 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। उस समय मंडल राजनीति, पिछड़ी जातियों का उभार और बाबरी मस्जिद विवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नया रूप दिया था। मुलायम सिंह ने खुद को पिछड़े वर्गों के नेता और मुस्लिम समुदाय के रक्षक के रूप में पेश किया। “MY Formula” यानी Muslim और Yadav समीकरण ने कई सालों तक पार्टी को मजबूती दी।

लेकिन समय के साथ पार्टी का नियंत्रण एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया। अखिलेश यादव, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव और अन्य पारिवारिक सदस्य पार्टी के प्रमुख चेहरे बनते गए। विरोधियों ने यहीं से आरोप लगाना शुरू किया कि समाजवादी पार्टी एक वैचारिक पार्टी के बजाय पारिवारिक कंपनी बन गई है, जहां पद और टिकट पारिवारिक समीकरणों के आधार पर तय होते हैं।

2016-17 में यह पारिवारिक संघर्ष खुलकर सामने आ गया। एक तरफ अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव थे, जबकि दूसरी तरफ मुलायम सिंह, शिवपाल यादव और अमर सिंह का गुट माना जाता था। यह टकराव सिर्फ टिकट बंटवारे या पदों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसे पुरानी और नई राजनीति के बीच की लड़ाई के रूप में भी देखा गया। अखिलेश यादव खुद को विकास और आधुनिक राजनीति का चेहरा बताने की कोशिश कर रहे थे, जबकि पुराना गुट पारंपरिक जातीय और संगठन आधारित राजनीति को महत्व दे रहा था।

इस पूरे विवाद में अमर सिंह की भूमिका भी काफी चर्चा में रही। अखिलेश समर्थकों का दावा था कि अमर सिंह परिवारिक विवाद को और बढ़ा रहे हैं और मुलायम सिंह पर प्रभाव डाल रहे हैं। उस समय यह भी कहा गया कि समाजवादी पार्टी का रणनीतिक नियंत्रण परिवार के बाहर के कुछ प्रभावशाली चेहरों के हाथों में जा रहा है।

भारतीय राजनीति में यह बहुत कम देखने को मिलता है कि एक सक्रिय पिता से बेटा पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले ले। लेकिन समाजवादी पार्टी में यह दृश्य भी देखने को मिला। पहले अखिलेश यादव को हटाने की कोशिश हुई, फिर अखिलेश गुट ने विरोध किया और आखिरकार चुनाव आयोग ने अखिलेश गुट को ही असली समाजवादी पार्टी माना। इस राजनीतिक लड़ाई को एक पारिवारिक त्रासदी के रूप में भी देखा गया।

समाजवादी पार्टी पर “गुंडा राज” के आरोप भी लंबे समय से लगते रहे हैं। विरोधियों का दावा रहा कि पार्टी के कुछ कार्यकालों में कानून-व्यवस्था कमजोर रही और बाहुबली तत्वों को राजनीतिक संरक्षण मिला। बीजेपी ने इस नैरेटिव को खासतौर पर शहरी और मध्यम वर्ग के वोटरों के बीच प्रभावी ढंग से उठाया।

इस बीच अपर्णा यादव का बीजेपी में जाना भी समाजवादी पार्टी के लिए बड़ा प्रतीकात्मक झटका माना गया। क्योंकि अपर्णा यादव मुलायम परिवार का हिस्सा थीं और उनके बीजेपी में जाने को “यादव परिवार में दरार” के रूप में पेश किया गया। प्रतीक यादव, जो अपर्णा के पति थे, इसी कारण फिर राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बने।

आज अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। वे PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और युवाओं व शहरी वोटरों को जोड़ना चाहते हैं। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि क्या समाजवादी पार्टी एक वैचारिक पार्टी है या फिर एक पारिवारिक सत्ता संरचना।

प्रतीक यादव की मौत ने एक बार फिर यह बहस जिंदा कर दी है कि यादव परिवार की अंदरूनी राजनीति ने समाजवादी पार्टी की दिशा पर कितना बड़ा असर डाला। वे खुद कभी बड़े राजनीतिक नेता नहीं रहे, लेकिन उनकी मौत ने मुलायम सिंह के दूसरे परिवार, अखिलेश से संबंधों और समाजवादी पार्टी के पारिवारिक समीकरणों को फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

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CM भगवंत सिंह मान ने जगतार सिंह हवारा को 10 दिन की पैरोल देने के लिए राज्यपाल से मुलाकात की

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मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आज पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात की और जगतार सिंह हवारा को मानवीय आधार पर 10 दिन की पैरोल देने के लिए उनके हस्तक्षेप की मांग की। मुख्यमंत्री ने कहा कि 31 साल बाद उनकी बीमार माता के अपने बेटे से मिलने की उम्मीद फिर से जगी है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि इस मामले में राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक है, क्योंकि मामले की सुनवाई दिल्ली में चल रही है। उन्होंने साथ ही भरोसा दिलाया कि यदि हवारा को पैरोल दी जाती है तो पंजाब सरकार कानून-व्यवस्था पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़ने देने के लिए पूरी जिम्मेदारी निभाएगी।

राज्यपाल से मानवीय आधार पर इस मामले पर विचार करने की अपील करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “जगतार सिंह हवारा पिछले 31 वर्षों से जेल में बंद हैं। उनकी माता वृद्धावस्था में हैं, उम्र से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं और इस समय अर्ध-बेहोशी की अवस्था में हैं। उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए मैंने राज्यपाल से अनुरोध किया है कि वे जगतार सिंह हवारा को जल्द से जल्द 10 दिन की पैरोल देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करें, ताकि वह अपनी माता से मिल सकें।”

उन्होंने आगे कहा, “चंडीगढ़ के प्रशासक होने के नाते इस संबंध में फैसला लेने के लिए राज्यपाल की सिफारिश आवश्यक है। इसलिए मामले के मानवीय पहलू और जगतार सिंह हवारा की माता की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए मैंने राज्यपाल से जल्द से जल्द फैसला लेने की अपील की है।”

राज्यपाल को कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए पंजाब सरकार की पूरी जिम्मेदारी का भरोसा दिलाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “जगतार सिंह हवारा के अपने घर आने के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने की राज्य सरकार पूरी गारंटी लेती है। उनके समर्थकों और परिवार के सदस्यों ने भी इस संबंध में राज्य सरकार को पूरा सहयोग देने का भरोसा दिलाया है।”
उन्होंने आगे कहा, “राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और पंजाब में कड़ी मेहनत से हासिल की गई शांति की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस कार्य में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी जाएगी। मैंने राज्यपाल को इस मामले को केंद्र सरकार के समक्ष उठाने के लिए राज्य सरकार की ओर से पूर्ण सहयोग का भरोसा भी दिया है।”

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जगतार सिंह हवारा की पैरोल को लेकर CM भगवंत मान की राज्यपाल से मुलाकात, 10 दिन की पैरोल की मांग

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मामले को लेकर पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात की। मुख्यमंत्री राजभवन पहुंचे और इस दौरान उन्होंने हवारा की पैरोल से जुड़े मामले पर राज्यपाल के साथ विस्तार से चर्चा की। बैठक में पंजाब सरकार की ओर से की जा रही कार्रवाई और पैरोल से संबंधित दस्तावेजों को लेकर भी बातचीत हुई।

मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बताया कि राज्यपाल की ओर से उन्हें भरोसा दिया गया है कि पैरोल से संबंधित सभी जरूरी दस्तावेज तैयार करके केंद्र सरकार को भेजे जाएंगे। पंजाब सरकार की ओर से जगतार सिंह हवारा के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग की गई है।

CM मान ने कहा कि इस मामले को मानवीय आधार पर भी देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, हवारा की मां पिछले लंबे समय से अपने बेटे की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसी मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए पंजाब सरकार ने पैरोल की मांग रखी है।

मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब सरकार ने राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर पूरी जिम्मेदारी और सुरक्षा की गारंटी दी है। यदि पैरोल मंजूर होती है तो इस दौरान किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा न हो, इसके लिए सरकार की ओर से आवश्यक सुरक्षा इंतजाम किए जाएंगे।

CM भगवंत मान ने कहा कि अब इस मामले में अगली कार्रवाई केंद्र सरकार की ओर से की जानी है। राज्यपाल द्वारा दस्तावेज केंद्र को भेजे जाने के बाद ही पैरोल को लेकर आगे का फैसला होगा।

जगतार सिंह हवारा फिलहाल जेल में बंद है और उसकी पैरोल को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की राज्यपाल से हुई इस मुलाकात के बाद अब पूरे मामले की अगली प्रक्रिया केंद्र सरकार के फैसले पर निर्भर करेगी।

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भाजपा मशीनरी पंजाब और उसके युवाओं को बदनाम करने के लिए फर्जी वीडियो फैला रही है: हरपाल सिंह चीमा

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आम आदमी पार्टी (आप) के सीनियर नेता और पंजाब के कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने राजस्थान का एक वीडियो शेयर करने, उसे गलत तरीके से पंजाब से जोड़ने और राज्य और उसके युवाओं को बदनाम करने की कोशिश करने के लिए पूर्व इंडियन क्रिकेटर और राज्यसभा मेंबर हरभजन सिंह पर निराशा जताई है।

मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने इस बात पर दुख जताया कि हरभजन सिंह, जिन्हें आप ने पंजाब के हितों को रिप्रेजेंट करने और राज्य के युवाओं के लिए काम करने के लिए राज्यसभा भेजा था, अब भाजपा के कैंपेन को प्रमोट कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हरभजन सिंह को पंजाब के युवाओं को खेल के प्रति प्रेरित करने के लिए और उनके भविष्य से जुड़े मुद्दे उठाने के लिए अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना चाहिए था, न कि गुमराह करने वाला कंटेंट शेयर करना चाहिए था जो पंजाब की छवि को ठेस पहुंचाता है।”

हरभजन सिंह के शेयर किए गए वीडियो का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया, “पंजाब पुलिस ने वीडियो की जांच की और पाया कि यह असल में भाजपा शासित राजस्थान के श्री गंगानगर का है और इसका पंजाब से कोई लेना-देना नहीं है।”

हरपाल सिंह चीमा ने आगे कहा, “तथ्यों की जांच करने के बजाय, भाजपा की आईटी मशीनरी दूसरे राज्यों से वीडियो उठाकर उन्हें पंजाब की घटनाओं के तौर पर दिखा रही है ताकि हमारे राज्य और उसके युवाओं को बदनाम किया जा सके।”

पंजाब सरकार के ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ मुहिम पर ज़ोर देते हुए, कैबिनेट मंत्री ने कहा, “भाजपा, नशों के विरुद्ध लड़ाई में भगवंत मान सरकार की तरक्की को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने एक ढृड़ ‘युद्ध नशेआं विरुद्ध’ मुहिम शुरू किया है, और सरकार ड्रग्स को खत्म करने और पंजाब के युवाओं को बेहतर मौके देने के लिए हर लेवल पर काम कर रही है।”

पंजाब में भाजपा के रिकॉर्ड की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “भाजपा को अपना रिकॉर्ड भी देखना चाहिए। 2007 से 2017 तक अकाली-भाजपा सरकार के 10 सालों के दौरान ड्रग्स का खतरा बढ़ गया था। इसी दौरान ‘चिट्टा’ और ‘स्मैक’ जैसे शब्द पंजाब से बड़े पैमाने पर जुड़ गए, जिसकी वजह से अनगिनत युवाओं की ज़िंदगी ड्रग्स की गिरफ़्त में आकर बर्बाद हो गई।”

खेल ढांचे पर सरकार के फोकस के बारे में बताते हुए हरपाल सिंह चीमा ने कहा, “भगवंत मान सरकार युवाओं को पॉजिटिव विकल्प देने के लिए स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत कर रही है। पंजाब में 3,000 से ज़्यादा स्पोर्ट्स स्टेडियम बनाए गए हैं, जबकि 6,000 और तैयार किए जा रहे हैं। हम स्पोर्ट्स में इन्वेस्ट कर रहे हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि पंजाब के युवा नशों से दूर रहें और एक हेल्दी और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ें।”

मंत्री ने कहा, “पंजाब के युवा और किसान भाजपा के प्रोपेगैंडा से गुमराह नहीं होंगे। पंजाब के लोग आप सरकार के जमीनी स्तर पर किए गए काम और भाजपा की सोशल मीडिया पर गुमराह करने वाली पोस्ट के ज़रिए राज्य को बदनाम करने की कोशिशों के बीच का अंतर समझते हैं।”

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