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अब कोई बच्चा भीख नहीं मांगेगा: Punjab Government का बड़ा कदम ‘Project Jeevanjyot-2’

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पंजाब सरकार ने बाल भिक्षावृत्ति को जड़ से खत्म करने के लिए एक बेहद सराहनीय कदम उठाया है। ‘प्रोजेक्ट जीवनज्योत-2’ नाम की इस योजना के जरिए अब तक 367 बच्चों को बचाया जा चुका है, जिनमें से 350 को उनके परिवारों को सौंप दिया गया है। वहीं 183 बच्चों को स्कूलों में दाखिल करवाया गया और 17 बच्चों को बाल केंद्रों में रखा गया है।

यह जानकारी पंजाब सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री डॉ. बलजीत कौर ने दी। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की सोच से प्रेरित होकर यह योजना शुरू की गई है।

क्या है प्रोजेक्ट जीवनज्योत-2?

यह योजना बाल भिक्षावृत्ति और बच्चों के शोषण को रोकने के लिए शुरू की गई है। इसका मकसद यह है कि पंजाब में कोई भी बच्चा अब सड़कों पर भीख मांगता न दिखे। अगर कोई व्यक्ति बच्चों से भीख मंगवाता है या उनका शोषण करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अब तक क्या हुआ इस योजना के तहत?

  • 753 छापेमारी अभियान चलाए गए
  • 367 बच्चे बचाए गए
  • 350 बच्चों को परिवारों से मिलाया गया
  • 17 बच्चे जिनके मां-बाप नहीं मिले, उन्हें बाल गृह भेजा गया
  • 183 बच्चों को स्कूलों में भर्ती कराया गया
  • 13 छोटे बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों में भेजा गया
  • 30 बच्चों को 4000 रु./माह की स्पॉन्सरशिप स्कीम में शामिल किया गया
  • 16 बच्चों को 1500 रु./माह की पेंशन योजना दी गई

अब बच्चों के लिए DNA टेस्ट भी होगा

सरकार ने एक नया और जरूरी कदम उठाया है। अगर कोई वयस्क किसी बच्चे को साथ लेकर भीख मंगवाता है और यह साफ नहीं है कि वे माता-पिता हैं या नहीं, तो उनका DNA टेस्ट कराया जाएगा। जब तक रिपोर्ट नहीं आती, बच्चा बाल गृह में सरकार की देखरेख में रहेगा।

अगर टेस्ट से पता चलता है कि वह व्यक्ति उस बच्चे का असली अभिभावक नहीं है, तो उस पर बाल तस्करी और शोषण के केस में कड़ी सजा दी जाएगी। यह सजा 5 साल से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है।

अभिभावकों को चेतावनी, बार-बार गलती पर सख्त कार्रवाई

अगर कोई अभिभावक अपने बच्चे से जबरदस्ती भीख मंगवाता है, तो पहली बार चेतावनी दी जाएगी। लेकिन अगर दोबारा ऐसा करते हुए पकड़ा गया, तो उसे “अनफिट पैरेंट” घोषित किया जाएगा और बच्चा सरकार की देखरेख में रहेगा।

प्रोजेक्ट जीवनज्योत-2 क्यों है ज़रूरी?

डॉ. बलजीत कौर ने कहा, “जब हम छोटे बच्चों को सड़कों पर भीख मांगते देखते हैं, तो यह न सिर्फ उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि हमारे समाज और राज्य की छवि पर भी सवाल खड़े करता है।”

उन्होंने बताया कि इस योजना से सिर्फ बच्चों को बचाया नहीं जा रहा, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि वे फिर से सड़कों पर न आएं। हर 3 महीने में चेक किया जाता है कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं या नहीं।

हालांकि, सरकार के प्रयासों के बावजूद 57 बच्चे फिर से स्कूल या घर से गायब हो गए हैं, जिससे ये शक पैदा होता है कि कहीं ये बच्चे भीख माफियाओं या तस्करों के शिकार तो नहीं हो गए?

हाल ही में की गई कार्रवाई

बीते दो दिनों में ही 18 जगह छापेमारी कर 41 बच्चों को बचाया गया है। इनमें से कई बच्चे दिव्यांग या शारीरिक शोषण के शिकार भी पाए गए हैं। सरकार ने उन्हें हेल्थ बीमा भी दिया है ताकि उनका इलाज सही से हो सके।

पंजाब बना देश का पहला राज्य

डॉ. बलजीत कौर ने दावा किया कि पंजाब देश का पहला राज्य है जिसने केंद्र सरकार के निर्देशों का इंतजार किए बिना अपने स्तर पर ये ठोस कदम उठाया है। यह योजना भिक्षावृत्ति अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस को ध्यान में रखकर चलाई जा रही है।

सरकार का साफ संदेश

सरकार ने साफ कर दिया है —

अगर कोई पंजाब में बच्चों को भीख मांगने के लिए मजबूर करेगा, तो उसे सख्त सज़ा भुगतनी पड़ेगी।”

अब वक्त आ गया है कि हम सब इस मिशन का हिस्सा बनें और बच्चों का बचपन सुरक्षित रखें।

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CM भगवंत सिंह मान ने बढ़ते केंद्रीकरण और शैक्षिक असमानता की चिंताओं को लेकर केंद्र से उच्च शिक्षा विधेयक पर पुनर्विचार करने की अपील की

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने प्रस्तावित ‘विकसित भारत शिक्षा अधिनियम विधेयक, 2025’ (उच्च शिक्षा विधेयक) का जोरदार विरोध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कानून उच्च शिक्षा को और महंगी बना सकता है, आम परिवारों के विद्यार्थियों के लिए अवसरों को कम कर सकता है और स्थानीय शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की राज्यों की क्षमता को खोखला कर सकता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे एक पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र से इस विधेयक पर पुनर्विचार करने और ऐसे सुधारों को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श करने की अपील की है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकते हैं।

देश भर के करोड़ों माता-पिता के अपने बच्चों की शिक्षा पर उम्मीदें और सपने टिकाए रखने का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा किसी किसान, मजदूर या दुकानदार के बच्चे के लिए अवसरों का मार्ग होनी चाहिए, न कि परिवारों पर आर्थिक बोझ। उन्होंने दावा किया कि भारत की प्रगति उच्च शिक्षा को विश्वविद्यालयों, बुनियादी ढांचे, फैकल्टी और अनुसंधान में अधिक निवेश के माध्यम से अधिक सुलभ और किफायती बनाने पर निर्भर करती है, न कि ऐसे उपायों पर जो लागतों को बढ़ाते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण करते हैं।

अपने पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने लिखा कि वे न केवल पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में बल्कि भारत भर के उन करोड़ों माता-पिता के प्रतिनिधि के रूप में लिख रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी उम्मीदें उनके बच्चों की शिक्षा से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा, “हर परिवार चाहता है कि उसका बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, अपने पैरों पर खड़ा हो, सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करे और देश की प्रगति में योगदान दे। इसी कारण शिक्षा केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं है, यह भारत के उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा सवाल है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “मुझे शुरू में उम्मीद थी कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता, जवाबदेही और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा। हालांकि विधेयक का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुझे गंभीर खतरा है कि यह उच्च शिक्षा से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णयों का केंद्रीकरण करने की कोशिश करता है, जिसके विद्यार्थियों, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।”

अपनी पहली बड़ी चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यह विधेयक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने की बजाय सत्ता के केंद्रीकरण पर अधिक केंद्रित प्रतीत होता है। उन्होंने कहा, “किसी भी शिक्षा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं को कितने प्रभावी ढंग से समझती है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में हर राज्य को अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि उच्च शिक्षा के बारे में किसी कानून से यह उम्मीद करना स्वाभाविक था कि वह गुणवत्ता, अनुसंधान, नवाचार, रोजगार योग्यता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करेगा। हालांकि विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि इसका मुख्य उद्देश्य नीति निर्माण की शक्तियों, मानकों, नियमों, मान्यता प्रणालियों और अपीलीय शक्तियों को केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करना है। उन्होंने कहा, “शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए जहां न्यूनतम राष्ट्रीय मानक आवश्यक हो सकते हैं, वहीं राज्यों को अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार प्रणालियां विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक उस संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता प्रतीत होता है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आगे कहा कि उनकी चिंता केवल राज्यों के अधिकारों की नहीं, बल्कि करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य की भी है। उन्होंने कहा, “भारत का हर राज्य अलग-अलग चुनौतियों से जूझ रहा है। कोई बेरोजगारी से निपट रहा है, कोई कौशल विकास, औद्योगिक आवश्यकताओं या प्रवासन से जूझ रहा है। पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों को इससे भी अधिक जटिल वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है।”

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य सरकारें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम, कौशल कार्यक्रम, औद्योगिक साझेदारी और रोजगारोन्मुखी पहलकदमियां विकसित करती हैं। उन्होंने कहा, “यदि शिक्षा के अधिकांश निर्णय दिल्ली में बैठी संस्थाओं द्वारा लिए जाएंगे तो राज्य धीरे-धीरे स्थानीय वास्तविकताओं को समझने और उसके अनुसार समाधान तैयार करने की अपनी क्षमता खो देंगे। परिणामस्वरूप, उच्च शिक्षा के केंद्रीकृत होने और इसकी व्यावहारिक महत्ता समाप्त होने का खतरा है।”

बढ़ते केंद्रीकरण के खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) जैसी केंद्रीय संस्थाओं के कामकाज का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में परीक्षा प्रबंधन, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जब केंद्रीय संस्थाएं स्वयं ऐसी चुनौतियों से जूझ रही हैं तो यह पूछना बिल्कुल उचित है कि क्या उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करना सचमुच सही दिशा है।”

मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच अधिक सहयोग ही बेहतर रास्ता है। उन्होंने कहा, “विभिन्न राज्यों द्वारा विकसित किए गए सफल मॉडलों को पूरे देश में साझा किया जाना चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक सहभागी और सहयोगात्मक होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक विपरीत दिशा में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने यह चिंता भी व्यक्त की कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा को और अधिक महंगा बना सकता है। उन्होंने सवाल किया, “विधेयक का अध्ययन करते समय मेरे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरा। यदि अधिकांश शक्तियां केंद्र सरकार के पास केंद्रित हो जाती हैं, यदि राज्य सरकारों की भूमिका लगातार सीमित होती जाती है और यदि राज्य विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों पर केंद्रीय नियामक नियंत्रण बढ़ता है, तो इन संस्थानों के संचालन और विकास के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे?”

मुख्यमंत्री ने संकेत दिया कि विधेयक इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देता। उन्होंने कहा, “यदि निर्णय लेने की शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाता है, जबकि आवश्यक वित्तीय सहायता की कोई गारंटी नहीं है, तो विश्वविद्यालयों पर अनिवार्य रूप से राजस्व बढ़ाने का दबाव पड़ेगा। इससे फीस में वृद्धि हो सकती है, स्व-वित्तपोषित (सेल्फ-फाइनेंस्ड) पाठ्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ सकती है और निजी निवेश पर निर्भरता भी बढ़ सकती है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने चेतावनी दी कि ऐसे मॉडल का सबसे अधिक बोझ मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “उच्च शिक्षा अवसरों का एक माध्यम होनी चाहिए। यह ऐसा विशेषाधिकार नहीं बनना चाहिए, जो केवल उन्हीं को उपलब्ध हो जो इसका खर्च उठा सकते हैं।”

मुख्यमंत्री ने उच्च शिक्षा के धीरे-धीरे हो रहे निजीकरण को लेकर भी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, “विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को धीरे-धीरे ऐसे मॉडल की ओर धकेला जा सकता है, जहां सरकारी संस्थान कमजोर हो जाएंगे और निजी क्षेत्र पर निर्भरता लगातार बढ़ती जाएगी।”

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नीति निर्माण, नियमों और नियंत्रण का पूर्ण केंद्रीकरण बिना किसी स्पष्ट वित्तीय जिम्मेदारी के किया जाता है, तो सरकारी विश्वविद्यालयों को निजी संस्थानों और निजी पूंजी पर निर्भर होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “ऐसे बदलाव का सीधा प्रभाव लाखों विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता उन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए लगातार बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दे रहे हैं।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जोर देकर कहा कि भारत जैसे देश में उच्च शिक्षा को आर्थिक बाधाओं से सीमित करने के बजाय एक अधिकार के रूप में मजबूत किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस विधेयक के वर्तमान स्वरूप को वापस ले और इसकी व्यापक समीक्षा करे। उन्होंने कहा, “भारत को ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं है, जो उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करे। हमें ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को उनके क्षेत्रों, उद्योगों, समाजों और युवाओं की आवश्यकताओं से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की अनुमति दे।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा की अधिकांश संस्थाएं राज्य सरकारों द्वारा स्थापित, संचालित और वित्तीय रूप से समर्थित होती हैं। इसलिए सुधारों को ऐसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जो राज्यों को अधिक अधिकार, अधिक लचीलापन और अधिक जिम्मेदारी प्रदान करे। उन्होंने कहा, “राज्यों को अपने युवाओं की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षणिक प्रणालियां विकसित करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही केंद्र सरकार को नियामक नियंत्रण बढ़ाने के बजाय उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।”

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेंट रेशो )को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा, “उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी संस्थानों को अधिक संसाधनों, मजबूत बुनियादी ढांचे, आधुनिक प्रयोगशालाओं, गुणवत्तापूर्ण फैकल्टी और आवश्यक अनुसंधान निधियों की आवश्यकता है। उन्हें नियंत्रण की अतिरिक्त परतों की आवश्यकता नहीं है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहती है, तो उसे प्रशासनिक केंद्रीकरण की बजाय शैक्षणिक निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालयों को अतिरिक्त नियंत्रण देने के बजाय संसाधन, स्वायत्तता और अवसर दिए जाने चाहिए। यह केवल केंद्र-राज्य संबंधों का प्रश्न नहीं है। यह करोड़ों विद्यार्थियों, उनके परिवारों और भारत के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्रगति आम परिवारों के सपनों को साकार करने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा, “जब किसी किसान का बेटा इंजीनियर बनता है, जब किसी मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है और जब किसी छोटे दुकानदार का बच्चा वैज्ञानिक बनता है, तब भारत आगे बढ़ता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे सपनों को साकार करना आसान बनाना चाहिए, न कि अधिक कठिन।”

अपनी अपील दोहराते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र सरकार से विधेयक वापस लेने और इसके स्थान पर ऐसा ढांचा लाने की मांग की, जो शिक्षा को अधिक सुलभ, किफायती, उच्च गुणवत्ता वाली और राज्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “देश शिक्षा पर नियंत्रण करके महान नहीं बनते। देश शिक्षा में निवेश करके महान बनते हैं।”

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‘आप’ ने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार से की पंजाब के मुख्यमंत्री के खिलाफ फर्जी वीडियो अभियान के पीछे मौजूद लोगों की जांच करने की अपील

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आम आदमी पार्टी (आप) ने रविवार को श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार से पंजाब के मुख्यमंत्री को निशाना बनाने वाले फर्जी वीडियो अभियान की गहराई से जांच सुनिश्चित करने की अपील की है। पार्टी ने कहा कि 1,100 से अधिक फ्रेम की फॉरेंसिक जांच ने पूरी तरह से साबित कर दिया है कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं है। ‘आप’ पंजाब के मीडिया प्रभारी बलतेज पन्नू ने कहा कि अब सारा ध्यान वीडियो में नजर आने वाले अभिनेता, इसे बनाने और निर्देशित करने वालों, और इस सोची-समझी साजिश के लिए पैसा लगाने वाले व्यक्तियों की पहचान करने की ओर होना चाहिए।

‘आप’ पंजाब के मीडिया इंचार्ज ने जत्थेदार साहिब से शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को तलब करने और यह जवाब मांगने की भी अपील की कि दूसरों से पहले उनके पास इस वीडियो के बारे में जानकारी कैसे मौजूद थी। उन्होंने यह भी नोट किया कि ‘आप’ पंजाब के अध्यक्ष अमन अरोड़ा और वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा पहले ही पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को आवश्यक सबूत सौंप चुके हैं और इस पूरे मामले की व्यापक जांच की मांग कर चुके हैं।

एक बयान में ‘आप’ पंजाब के राज्य मीडिया इंचार्ज बलतेज पन्नू ने कहा कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान लगातार कह रहे हैं कि यह वीडियो असली नहीं है और एक विस्तृत फॉरेंसिक जांच ने पहले ही साबित कर दिया है कि उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा, “जांच के दौरान वीडियो के 1,100 से अधिक फ्रेम का विश्लेषण किया गया और यह स्पष्ट रूप से साबित हुआ कि इसमें दिखाया गया व्यक्ति सीएम भगवंत सिंह मान नहीं हैं। फॉरेंसिक जांच ने वीडियो के साथ मुख्यमंत्री के किसी भी संबंध को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है।”

उन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार से सम्मानपूर्वक अपील की कि वह इस मामले की गहराई से जांच सुनिश्चित करें और वीडियो बनाने में शामिल हर व्यक्ति की पहचान करें। बलतेज पन्नू ने कहा, “अब कई सवालों के जवाब चाहिए। वीडियो में दिखाई देने वाला अभिनेता कौन था? यह किसने बनाया? इसका निर्देशन किसने किया? और सबसे महत्वपूर्ण, इस साजिश को किसने वित्तीय सहायता दी? सच्चाई सामने आनी चाहिए और जिम्मेदार सभी लोगों की पहचान होनी चाहिए।”

उन्होंने दावा किया कि पूरे मामले की व्यापक जांच के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। बलतेज पन्नू ने बताया कि पंजाब ‘आप’ के अध्यक्ष अमन अरोड़ा और कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने हाल ही में पुलिस महानिदेशक से मुलाकात करके सारी आवश्यक जानकारी सौंपी थी और साजिश में शामिल हर व्यक्ति को बेनकाब करने के लिए सही जांच की मांग की थी। उन्होंने आगे कहा, “सबूत पहले ही पुलिस अधिकारियों को सौंप दिए गए हैं। हम एक निष्पक्ष और पक्षपात रहित जांच की उम्मीद करते हैं ताकि इस फर्जी वीडियो अभियान को बनाने, प्रचारित करने और इसे फंड देने वाले हर व्यक्ति की पहचान की जा सके।”

बलतेज पन्नू ने श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार से आगे अपील की कि वह शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को तलब करें और इस मुद्दे पर उनके बयानों के बारे में स्पष्टीकरण मांगें। पन्नू ने कहा, “अगर सुखबीर सिंह बादल यह कह रहे थे कि सीएम भगवंत सिंह मान ने दावा किया था कि वीडियो एआई द्वारा तैयार की गई है, तो यह आंतरिक जानकारी कहां से आई और उन्होंने इसे कैसे हासिल किया? इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए। ऐसी जानकारी के स्रोत और जिन परिस्थितियों में यह उन तक पहुंची, उसकी भी जांच होनी चाहिए।”

पार्टी के रुख को दोहराते हुए बलतेज पन्नू ने कहा कि इस फर्जी वीडियो अभियान के पीछे की सच्चाई पूरी तरह से सामने आनी चाहिए और एक निष्पक्ष व व्यापक जांच के माध्यम से इसे बनाने, आगे बढ़ाने और इसके लिए पैसा लगाने वाले सभी जिम्मेदार लोगों की पहचान की जानी चाहिए।

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अमृतसर सीमा के पास 27 किलो हेरोइन बरामद, BSF और पंजाब पुलिस की बड़ी कार्रवाई

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पंजाब में नशा तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के दौरान सुरक्षा एजेंसियों को एक और बड़ी सफलता मिली है। अमृतसर में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बीएसएफ और पंजाब पुलिस ने संयुक्त ऑपरेशन के दौरान 27 किलो हेरोइन की बड़ी खेप बरामद की है।

मिली जानकारी के अनुसार सुरक्षा एजेंसियों को गुप्त सूचना मिली थी कि पाकिस्तान में बैठे तस्करों ने ड्रोन की मदद से अमृतसर के घरिंडा क्षेत्र में नशीले पदार्थों की एक बड़ी खेप भेजी है। सूचना मिलते ही बीएसएफ और पंजाब पुलिस की टीमें सक्रिय हो गईं और सीमावर्ती इलाके में संयुक्त तलाशी अभियान शुरू किया गया।

तलाशी के दौरान पुल मोरां के पास संदिग्ध स्थान की घेराबंदी कर जांच की गई, जहां से 27 किलो हेरोइन बरामद हुई। बरामद हेरोइन की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है। इस कार्रवाई के साथ सीमा पार से नशा तस्करी की एक बड़ी कोशिश को नाकाम कर दिया गया है।

सुरक्षा एजेंसियां मामले की गहराई से जांच कर रही हैं। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यह खेप किसके लिए भेजी गई थी और इस नेटवर्क से जुड़े स्थानीय तस्कर कौन हैं। साथ ही ड्रोन के जरिए नशे की तस्करी करने वाले सीमा पार बैठे तस्करों के नेटवर्क की भी जांच की जा रही है।

गौरतलब है कि इससे दो दिन पहले भी अमृतसर के अजनाला-रामदास क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों ने हथियार तस्करी के एक बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था। उस कार्रवाई के दौरान 25 पिस्तौल, एक AK-47 राइफल, 360 जिंदा कारतूस, 47 मैगजीन और एक बुलेटप्रूफ जैकेट बरामद की गई थी।

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन गतिविधियों और तस्करी के प्रयासों को रोकने के लिए लगातार तलाशी और निगरानी अभियान चलाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब को नशा और हथियार तस्करी से मुक्त बनाने के लिए ऐसी कार्रवाइयां आगे भी जारी रहेंगी।

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