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ABVP की जीत पर AAP/ASAP का बड़ा सवाल: विवादित दस्तावेज़ों और चुनावी पात्रता पर हाईकोर्ट जाएगी टीम, PU प्रशासन की चुप्पी पर भी उठे सवाल

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पंजाब यूनिवर्सिटी में हुए छात्र संघ चुनाव के बाद जहां ABVP उम्मीदवार अंकित बिधान की जीत की खबर सामने आ रही है, वहीं आम आदमी पार्टी से जुड़ी छात्र टीम ASAP ने इस पूरे चुनाव और विशेष रूप से ABVP उम्मीदवार की चुनावी पात्रता को हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है।

ASAP का कहना है कि चुनाव से पहले ही उसने पंजाब यूनिवर्सिटी प्रशासन को उम्मीदवार की पात्रता, उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड, कथित Unfair Means (UMC) मामले, चुनाव लड़ने की योग्यता और दस्तावेज़ों से जुड़े गंभीर सवालों से लिखित/औपचारिक रूप से अवगत कराया था। प्रशासन की ओर से मामले पर संज्ञान लेने का भरोसा भी दिया गया, लेकिन चुनाव संपन्न होने तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

ASAP के अनुसार, अब इस पूरे मामले को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष रखा जाएगा और यह सवाल उठाया जाएगा कि जब किसी उम्मीदवार की चुनाव लड़ने की पात्रता पर गंभीर आपत्तियां पहले से विश्वविद्यालय के संज्ञान में थीं, तो उन पर निर्णय लिए बिना उसे चुनाव लड़ने की अनुमति किस आधार पर दी गई।

“जिस उम्मीदवारी पर चुनाव से पहले सवाल उठे, उसके परिणाम को बिना जांच के कैसे वैध माना जा सकता है?”

ASAP का आरोप है कि अंकित बिधान के शैक्षणिक एवं अनुशासनात्मक रिकॉर्ड को लेकर गंभीर तथ्य हैं, जिनका उल्लेख चुनावी प्रक्रिया में किया जाना आवश्यक था। टीम के मुताबिक, बिधान पंजाब यूनिवर्सिटी में LL.B. की पढ़ाई के दौरान कई परीक्षाओं में असफल रहा और उसके खिलाफ Unfair Means का मामला भी सामने आया, जिसके चलते उसे वर्ष 2023 से 2025 तक विश्वविद्यालय से debar किया गया था।

ASAP का यह भी कहना है कि इसके बावजूद बाद में गुजरात की Sabarmati University से प्राप्त MA डिग्री के आधार पर पंजाब यूनिवर्सिटी में PhD में प्रवेश लिया गया। इसी प्रवेश की पात्रता और संबंधित दस्तावेज़ों की वैधता को लेकर भी टीम ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

ASAP का दावा है कि उम्मीदवार की शैक्षणिक पात्रता और दस्तावेज़ों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक थी, लेकिन इन सवालों के बावजूद उसे चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई।

Lingdoh Committee के नियमों का भी हवाला

ASAP ने छात्र चुनावों के लिए लागू Lyngdoh Committee recommendations का हवाला देते हुए कहा है कि चुनावी पात्रता के संबंध में विश्वविद्यालय को उम्मीदवार के अनुशासनात्मक और अकादमिक रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए थी।

टीम का कहना है कि यदि किसी छात्र को अनुशासनात्मक कारणों से विश्वविद्यालय से debar किया गया हो या उसके academic/disciplinary मामलों को लेकर गंभीर स्थिति हो, तो उसकी चुनावी पात्रता की जांच महज औपचारिकता नहीं हो सकती।

“हमारा सवाल किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से है। अगर नियम सभी छात्रों के लिए समान हैं, तो वे किसी राजनीतिक संगठन के उम्मीदवार के लिए अलग कैसे हो सकते हैं?” — ASAP

चुनाव से पहले प्रशासन को बताया, फिर भी चुनाव करा दिया गया: अब कोर्ट में जवाब मांगेगी टीम

ASAP ने कहा कि सबसे गंभीर प्रश्न पंजाब यूनिवर्सिटी प्रशासन की भूमिका को लेकर है। टीम ने दावा किया कि चुनाव से पहले ही प्रशासन को इन सभी आपत्तियों और दस्तावेज़ों से संबंधित सवालों की जानकारी दे दी गई थी और प्रशासन ने मामले को देखने की बात कही थी।

इसके बावजूद चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ी और मतदान संपन्न हो गया।

ASAP का कहना है कि अब प्रशासनिक स्तर पर जवाब नहीं, बल्कि न्यायिक स्तर पर जवाब मांगा जाएगा।

टीम जल्द ही पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख कर यह मांग रखेगी कि उम्मीदवार की चुनावी पात्रता, उसके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों और उसके कथित disciplinary record की निष्पक्ष जांच की जाए तथा यदि चुनावी नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो चुनाव परिणाम की वैधता पर भी उचित कानूनी निर्णय लिया जाए।

“जीत का जश्न बाद में, पहले दस्तावेज़ और पात्रता की जांच हो”

ASAP ने स्पष्ट किया कि उसका संघर्ष किसी छात्र संगठन की जीत या हार तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या विश्वविद्यालय के छात्र चुनावों में नियम सभी पर बराबर लागू होंगे या राजनीतिक प्रभाव के आधार पर कुछ उम्मीदवारों को अलग मानदंड दिए जाएंगे।

ASAP ने कहा कि अगर किसी उम्मीदवार की पात्रता पर चुनाव से पहले ही गंभीर सवाल विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रख दिए गए थे, तो उनका निपटारा किए बिना चुनाव करवाना पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।

“अगर दस्तावेज़ सही हैं तो जांच से डरने की जरूरत नहीं है। अगर पात्रता सही है तो कोर्ट में भी वह साबित हो जाएगी। लेकिन जांच से पहले ही जीत को अंतिम सत्य मान लेना स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

ASAP ने कहा कि वह इस मामले को पूरी मजबूती के साथ कानूनी मंच पर ले जाएगी और विश्वविद्यालय चुनावों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और नियमों के समान अनुपालन की लड़ाई जारी रखेगी।

“जिस मुद्दे को चुनाव से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन को देखना चाहिए था, अब वही मुद्दा अदालत के सामने जाएगा। चुनाव खत्म हुआ है, सवाल खत्म नहीं हुए।”

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दिल्ली मार्च पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, रोक लगाने से किया इनकार

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5 सितंबर को दिल्ली में होने वाले काकरोच जनता पार्टी के मार्च को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने प्रस्तावित मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं आया है, जिसके आधार पर यह माना जाए कि मार्च के कारण किसी तरह की अप्रिय या हिंसक घटना होने की आशंका है।

मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मार्च में शामिल होने वाले सभी पक्षों से कानून का पालन करने और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करने की उम्मीद की जाती है।

दरअसल, इस मामले को लेकर रिटायर्ड दिल्ली पुलिस अधिकारी राजेंद्र सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में 5 सितंबर को प्रस्तावित मार्च पर रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दिल्ली में BRICS सम्मेलन को देखते हुए राजधानी में बड़े जुलूस और प्रदर्शनों की अनुमति देना सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

याचिका में यह भी चिंता जताई गई थी कि बड़े स्तर पर लोगों के जुटने से राजधानी में यातायात व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन आशंकाओं के आधार पर फिलहाल मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

अदालत ने प्रशासन की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी कार्यक्रम के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित अधिकारी आवश्यक कदम उठा सकते हैं। साथ ही मार्च में शामिल लोगों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी गतिविधियां कानून के दायरे में रहें और किसी तरह की स्थिति न बिगड़े।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब 5 सितंबर को होने वाले मार्च को लेकर आगे की नजर दिल्ली प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की तैयारियों पर रहेगी। प्रशासन के सामने जहां कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होगी, वहीं मार्च में शामिल संगठनों और लोगों से भी शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से कार्यक्रम में हिस्सा लेने की उम्मीद की जा रही है।

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1 सितंबर से LPG से जुड़े बदलेंगे कई नियम, जानें आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर

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अगर आप घर में LPG सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। 1 सितंबर से LPG सिलेंडर और गैस कनेक्शन से जुड़े कुछ अहम नियमों में बदलाव होने जा रहा है। इन बदलावों का असर सीधे तौर पर गैस उपभोक्ताओं और उनकी जेब पर पड़ सकता है।

सबसे पहले बात LPG e-KYC की। LPG ग्राहकों के लिए e-KYC पूरा करना जरूरी किया गया है। इसकी अंतिम तारीख पहले 23 अगस्त बताई गई थी, जिसे बढ़ाकर 31 अगस्त किया गया था। ऐसे में जिन ग्राहकों ने अभी तक अपनी e-KYC पूरी नहीं की है, उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

नियमों के अनुसार, e-KYC पूरी नहीं होने की स्थिति में LPG कनेक्शन को अस्थायी रूप से सस्पेंड किया जा सकता है। इसके अलावा, सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर का लाभ लेने में भी दिक्कत आ सकती है। इसलिए जिन ग्राहकों की e-KYC अभी बाकी है, उन्हें समय रहते इसे पूरा कर लेना चाहिए।

इसके साथ ही 1 सितंबर से घरेलू PNG यानी पाइप्ड नेचुरल गैस को बढ़ावा देने के लिए नई प्रोत्साहन योजना लागू किए जाने की बात कही जा रही है। इसका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा घरों तक पाइपलाइन के जरिए रसोई गैस की सुविधा पहुंचाना है।

अब बात LPG सिलेंडर की कीमतों की। तेल कंपनियां हर महीने की शुरुआत में LPG की कीमतों की समीक्षा करती हैं। ऐसे में 1 सितंबर को घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव होता है या नहीं, इस पर उपभोक्ताओं की नजर रहेगी। कीमत बढ़ने या घटने का सीधा असर घर के मासिक बजट पर पड़ सकता है।

LPG रिफिल की बुकिंग को लेकर भी नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले ग्राहकों के लिए दो सिलेंडरों की बुकिंग के बीच करीब 25 दिनों का अंतर होना चाहिए, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर 45 दिन बताया गया है।

यानी 1 सितंबर से LPG ग्राहकों के लिए e-KYC, सिलेंडर की कीमत और रिफिल बुकिंग जैसे मामलों पर नजर रखना जरूरी होगा। अगर आप LPG कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं, तो अपनी e-KYC की स्थिति जरूर जांच लें और गैस बुकिंग से जुड़े नियमों की भी जानकारी रखें, ताकि आगे किसी तरह की परेशानी न हो।

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कनाडा में विदेशी वर्कर्स को बड़ी राहत, Work Permit के नियमों में अहम बदलाव

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कनाडा में पहले से रह रहे विदेशी कामगारों के लिए राहत की खबर सामने आई है। कनाडा सरकार ने Work Permit Extension से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया है। नए नियम 21 अगस्त 2026 से लागू किए गए हैं, जिसके तहत पात्र विदेशी वर्कर्स को अपने परमिट से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा समय मिलेगा।

नई व्यवस्था के तहत, जिन विदेशी कामगारों के नियोक्ता की आवेदन प्रक्रिया अभी जारी है, उनके लिए Grace Period को 60 दिन से बढ़ाकर 90 दिन कर दिया गया है। यानी अब इमिग्रेशन अधिकारी Work Permit आवेदन पर अंतिम फैसला लेने से पहले 90 दिनों तक इंतजार कर सकेंगे। इससे विदेशी कामगारों को अपने नियोक्ता की ओर से जरूरी सकारात्मक आवेदन जमा करवाने के लिए अतिरिक्त 30 दिनों का समय मिल सकेगा।

हालांकि, इस सुविधा का लाभ लेने के लिए कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी। कामगार का कनाडा में मौजूद होना जरूरी है और उसके मौजूदा Work Permit की अवधि खत्म होने में दो सप्ताह या उससे कम समय बचा होना चाहिए।

इसके अलावा, संबंधित कामगार के नियोक्ता की ओर से ESDC के पास पूरी आवेदन प्रक्रिया पहले से शुरू की गई होनी चाहिए। इन शर्तों को पूरा करने वाले योग्य वर्कर्स को नए नियमों के तहत राहत मिल सकती है।

बताया जा रहा है कि इस बदलाव से उन विदेशी कामगारों को सबसे ज्यादा फायदा होगा, जिनका Work Permit खत्म होने वाला होता है और उन्हें नई मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। नए नियमों से पात्र लोगों को अपना मौजूदा इमिग्रेशन स्टेटस बनाए रखते हुए कनाडा में कानूनी रूप से काम जारी रखने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब कई देशों में विदेशी कामगारों और प्रवासियों से जुड़े नियमों को लेकर सख्ती देखने को मिल रही है। कनाडा में पहले से मौजूद पात्र विदेशी वर्कर्स के लिए यह बदलाव Work Permit Extension की प्रक्रिया में कुछ अतिरिक्त राहत देने वाला माना जा रहा है।

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