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CM भगवंत सिंह मान ने बढ़ते केंद्रीकरण और शैक्षिक असमानता की चिंताओं को लेकर केंद्र से उच्च शिक्षा विधेयक पर पुनर्विचार करने की अपील की

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने प्रस्तावित ‘विकसित भारत शिक्षा अधिनियम विधेयक, 2025’ (उच्च शिक्षा विधेयक) का जोरदार विरोध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कानून उच्च शिक्षा को और महंगी बना सकता है, आम परिवारों के विद्यार्थियों के लिए अवसरों को कम कर सकता है और स्थानीय शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की राज्यों की क्षमता को खोखला कर सकता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे एक पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र से इस विधेयक पर पुनर्विचार करने और ऐसे सुधारों को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श करने की अपील की है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकते हैं।

देश भर के करोड़ों माता-पिता के अपने बच्चों की शिक्षा पर उम्मीदें और सपने टिकाए रखने का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा किसी किसान, मजदूर या दुकानदार के बच्चे के लिए अवसरों का मार्ग होनी चाहिए, न कि परिवारों पर आर्थिक बोझ। उन्होंने दावा किया कि भारत की प्रगति उच्च शिक्षा को विश्वविद्यालयों, बुनियादी ढांचे, फैकल्टी और अनुसंधान में अधिक निवेश के माध्यम से अधिक सुलभ और किफायती बनाने पर निर्भर करती है, न कि ऐसे उपायों पर जो लागतों को बढ़ाते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण करते हैं।

अपने पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने लिखा कि वे न केवल पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में बल्कि भारत भर के उन करोड़ों माता-पिता के प्रतिनिधि के रूप में लिख रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी उम्मीदें उनके बच्चों की शिक्षा से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा, “हर परिवार चाहता है कि उसका बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, अपने पैरों पर खड़ा हो, सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करे और देश की प्रगति में योगदान दे। इसी कारण शिक्षा केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं है, यह भारत के उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा सवाल है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “मुझे शुरू में उम्मीद थी कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता, जवाबदेही और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा। हालांकि विधेयक का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुझे गंभीर खतरा है कि यह उच्च शिक्षा से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णयों का केंद्रीकरण करने की कोशिश करता है, जिसके विद्यार्थियों, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।”

अपनी पहली बड़ी चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यह विधेयक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने की बजाय सत्ता के केंद्रीकरण पर अधिक केंद्रित प्रतीत होता है। उन्होंने कहा, “किसी भी शिक्षा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं को कितने प्रभावी ढंग से समझती है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में हर राज्य को अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि उच्च शिक्षा के बारे में किसी कानून से यह उम्मीद करना स्वाभाविक था कि वह गुणवत्ता, अनुसंधान, नवाचार, रोजगार योग्यता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करेगा। हालांकि विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि इसका मुख्य उद्देश्य नीति निर्माण की शक्तियों, मानकों, नियमों, मान्यता प्रणालियों और अपीलीय शक्तियों को केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करना है। उन्होंने कहा, “शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए जहां न्यूनतम राष्ट्रीय मानक आवश्यक हो सकते हैं, वहीं राज्यों को अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार प्रणालियां विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक उस संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता प्रतीत होता है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आगे कहा कि उनकी चिंता केवल राज्यों के अधिकारों की नहीं, बल्कि करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य की भी है। उन्होंने कहा, “भारत का हर राज्य अलग-अलग चुनौतियों से जूझ रहा है। कोई बेरोजगारी से निपट रहा है, कोई कौशल विकास, औद्योगिक आवश्यकताओं या प्रवासन से जूझ रहा है। पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों को इससे भी अधिक जटिल वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है।”

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य सरकारें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम, कौशल कार्यक्रम, औद्योगिक साझेदारी और रोजगारोन्मुखी पहलकदमियां विकसित करती हैं। उन्होंने कहा, “यदि शिक्षा के अधिकांश निर्णय दिल्ली में बैठी संस्थाओं द्वारा लिए जाएंगे तो राज्य धीरे-धीरे स्थानीय वास्तविकताओं को समझने और उसके अनुसार समाधान तैयार करने की अपनी क्षमता खो देंगे। परिणामस्वरूप, उच्च शिक्षा के केंद्रीकृत होने और इसकी व्यावहारिक महत्ता समाप्त होने का खतरा है।”

बढ़ते केंद्रीकरण के खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) जैसी केंद्रीय संस्थाओं के कामकाज का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में परीक्षा प्रबंधन, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जब केंद्रीय संस्थाएं स्वयं ऐसी चुनौतियों से जूझ रही हैं तो यह पूछना बिल्कुल उचित है कि क्या उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करना सचमुच सही दिशा है।”

मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच अधिक सहयोग ही बेहतर रास्ता है। उन्होंने कहा, “विभिन्न राज्यों द्वारा विकसित किए गए सफल मॉडलों को पूरे देश में साझा किया जाना चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक सहभागी और सहयोगात्मक होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक विपरीत दिशा में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने यह चिंता भी व्यक्त की कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा को और अधिक महंगा बना सकता है। उन्होंने सवाल किया, “विधेयक का अध्ययन करते समय मेरे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरा। यदि अधिकांश शक्तियां केंद्र सरकार के पास केंद्रित हो जाती हैं, यदि राज्य सरकारों की भूमिका लगातार सीमित होती जाती है और यदि राज्य विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों पर केंद्रीय नियामक नियंत्रण बढ़ता है, तो इन संस्थानों के संचालन और विकास के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे?”

मुख्यमंत्री ने संकेत दिया कि विधेयक इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देता। उन्होंने कहा, “यदि निर्णय लेने की शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाता है, जबकि आवश्यक वित्तीय सहायता की कोई गारंटी नहीं है, तो विश्वविद्यालयों पर अनिवार्य रूप से राजस्व बढ़ाने का दबाव पड़ेगा। इससे फीस में वृद्धि हो सकती है, स्व-वित्तपोषित (सेल्फ-फाइनेंस्ड) पाठ्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ सकती है और निजी निवेश पर निर्भरता भी बढ़ सकती है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने चेतावनी दी कि ऐसे मॉडल का सबसे अधिक बोझ मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “उच्च शिक्षा अवसरों का एक माध्यम होनी चाहिए। यह ऐसा विशेषाधिकार नहीं बनना चाहिए, जो केवल उन्हीं को उपलब्ध हो जो इसका खर्च उठा सकते हैं।”

मुख्यमंत्री ने उच्च शिक्षा के धीरे-धीरे हो रहे निजीकरण को लेकर भी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, “विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को धीरे-धीरे ऐसे मॉडल की ओर धकेला जा सकता है, जहां सरकारी संस्थान कमजोर हो जाएंगे और निजी क्षेत्र पर निर्भरता लगातार बढ़ती जाएगी।”

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नीति निर्माण, नियमों और नियंत्रण का पूर्ण केंद्रीकरण बिना किसी स्पष्ट वित्तीय जिम्मेदारी के किया जाता है, तो सरकारी विश्वविद्यालयों को निजी संस्थानों और निजी पूंजी पर निर्भर होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “ऐसे बदलाव का सीधा प्रभाव लाखों विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता उन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए लगातार बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दे रहे हैं।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जोर देकर कहा कि भारत जैसे देश में उच्च शिक्षा को आर्थिक बाधाओं से सीमित करने के बजाय एक अधिकार के रूप में मजबूत किया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस विधेयक के वर्तमान स्वरूप को वापस ले और इसकी व्यापक समीक्षा करे। उन्होंने कहा, “भारत को ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं है, जो उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करे। हमें ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को उनके क्षेत्रों, उद्योगों, समाजों और युवाओं की आवश्यकताओं से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की अनुमति दे।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा की अधिकांश संस्थाएं राज्य सरकारों द्वारा स्थापित, संचालित और वित्तीय रूप से समर्थित होती हैं। इसलिए सुधारों को ऐसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जो राज्यों को अधिक अधिकार, अधिक लचीलापन और अधिक जिम्मेदारी प्रदान करे। उन्होंने कहा, “राज्यों को अपने युवाओं की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षणिक प्रणालियां विकसित करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही केंद्र सरकार को नियामक नियंत्रण बढ़ाने के बजाय उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।”

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेंट रेशो )को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा, “उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी संस्थानों को अधिक संसाधनों, मजबूत बुनियादी ढांचे, आधुनिक प्रयोगशालाओं, गुणवत्तापूर्ण फैकल्टी और आवश्यक अनुसंधान निधियों की आवश्यकता है। उन्हें नियंत्रण की अतिरिक्त परतों की आवश्यकता नहीं है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहती है, तो उसे प्रशासनिक केंद्रीकरण की बजाय शैक्षणिक निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालयों को अतिरिक्त नियंत्रण देने के बजाय संसाधन, स्वायत्तता और अवसर दिए जाने चाहिए। यह केवल केंद्र-राज्य संबंधों का प्रश्न नहीं है। यह करोड़ों विद्यार्थियों, उनके परिवारों और भारत के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्रगति आम परिवारों के सपनों को साकार करने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा, “जब किसी किसान का बेटा इंजीनियर बनता है, जब किसी मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है और जब किसी छोटे दुकानदार का बच्चा वैज्ञानिक बनता है, तब भारत आगे बढ़ता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे सपनों को साकार करना आसान बनाना चाहिए, न कि अधिक कठिन।”

अपनी अपील दोहराते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र सरकार से विधेयक वापस लेने और इसके स्थान पर ऐसा ढांचा लाने की मांग की, जो शिक्षा को अधिक सुलभ, किफायती, उच्च गुणवत्ता वाली और राज्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “देश शिक्षा पर नियंत्रण करके महान नहीं बनते। देश शिक्षा में निवेश करके महान बनते हैं।”

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तरनतारन में बड़ी कामयाबी, BSF और पंजाब पुलिस ने हथियारों की बड़ी खेप बरामद की

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पंजाब में सीमा पार से हथियारों की तस्करी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत पंजाब पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। तरनतारन पुलिस ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ संयुक्त अभियान चलाकर हथियारों की एक बड़ी खेप बरामद की है।

इस कार्रवाई के दौरान एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने उसके कब्जे से एक MP-09 राइफल और सात आधुनिक पिस्तौल बरामद की हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि ये हथियार कथित तौर पर पाकिस्तान में बैठे राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा पंजाब में सक्रिय गैंगस्टर नेटवर्क की मदद से भेजे गए थे।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इन हथियारों का इस्तेमाल राज्य में टारगेट किलिंग की घटनाओं को अंजाम देने, दहशत का माहौल बनाने और पंजाब की कानून-व्यवस्था तथा सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने की साजिश के तहत किया जाना था।

पुलिस का कहना है कि यह नेटवर्क लंबे समय से सीमा पार बैठे हैंडलरों के निर्देश पर काम कर रहा था। गिरफ्तार आरोपी से लगातार पूछताछ की जा रही है, ताकि पूरे मॉड्यूल, उसके अन्य सदस्यों और इस तस्करी नेटवर्क से जुड़े सभी लोगों की पहचान की जा सके।

पंजाब पुलिस और बीएसएफ ने स्पष्ट किया है कि सीमा पार से होने वाली हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ संयुक्त अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा। साथ ही इस मामले से जुड़े अन्य आरोपियों की तलाश और पूरे नेटवर्क की गहन जांच की जा रही है।

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अमन अरोड़ा ने शाहकोट हलके में नौकरियों के मामले में कांग्रेसी विधायक लाडी को घेरा

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पंजाब विधान सभा में विपक्ष को घेरते हुए पंजाब के रोजगार सृजन, कौशल विकास और प्रशिक्षण तथा उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री श्री अमन अरोड़ा ने कहा कि राज्य सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में 68000 से अधिक सरकारी नौकरियां प्रदान की हैं और 1,83,837 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ निजी क्षेत्र में 6,36,636 नौकरियों के अवसर पैदा किए हैं।

आज सदन में विधायक स. कुलदीप सिंह धालीवाल द्वारा रोजगार के अवसरों के बारे में पेश किए गए प्रस्ताव पर चर्चा का समापन करते हुए श्री अमन अरोड़ा ने सदन को बताया कि इस बड़े निवेश प्रवाह ने सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से निजी क्षेत्र में 6.36 लाख से अधिक नौकरियों के अवसर पैदा किए हैं। उन्होंने जापान की प्रमुख स्टील कंपनी आइची स्टील का उदाहरण दिया, जिसने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की सुविधाओं और कारोबार को आसान बनाने वाली नीतियों से प्रभावित होकर अपने नियोजित निवेश को 500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1100 करोड़ रुपये कर दिया है।

कांग्रेस के विधायक हरदेव सिंह लाडी शेरोवालिया द्वारा उनके शाहकोट विधानसभा हलके में किसी भी व्यक्ति को सरकारी नौकरी न मिलने के आरोप पर श्री अमन अरोड़ा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें अपने शाहकोट हलके में सभा रखने की चुनौती दी। उन्होंने कहा, ”मैं आऊंगा और हम लोगों से पूछेंगे, क्या उन्हें नौकरियां मिली हैं। अगर मैं गलत हुआ, तो मैं मंत्री पद और विधायक के तौर पर इस्तीफा दे दूंगा। अगर मैं सही हुआ तो लाडी को इस्तीफा देना होगा।” कांग्रेसी विधायक लाडी ने यह चुनौती स्वीकार नहीं की और चर्चा छोड़कर बैठ गए।

उन्होंने जोर देकर कहा कि पंजाब सरकार ने सभी सरकारी नौकरियां बिना किसी रिश्वत या सिफारिश के केवल योग्यता के आधार पर दी हैं।

श्री अमन अरोड़ा ने कौशल विकास के लिए राज्य सरकार के रिकॉर्ड प्रयासों का हवाला देते हुए बताया कि राज्य के बजट में 75 सालों में पहली बार कौशल विकास मिशन के लिए 25 करोड़ रुपये रखे गए हैं, जो पिछले साल 10 करोड़ रुपये थे। उन्होंने दावा किया कि 22 लाख से अधिक नौजवानों को रोजगार में प्लेसमेंट कैंपों और हैंडहोल्डिंग अभ्यासों के माध्यम से सुविधा दी गई है। उन्होंने बताया कि सुनाम में हाल ही में आयोजित एक मेगा रोजगार मेले में, 61 कंपनियों ने भाग लिया और लगभग 700 नौजवानों को मौके पर ही नियुक्ति पत्र जारी किए।

रोजगार सृजन मंत्री ने आगे बताया कि राज्य सरकार द्वारा 100 करोड़ रुपये की लागत से संगरूर जिले में विश्व स्तरीय संत अतर सिंह महाराज आर्म्ड फोर्सेज प्रेपरेटरी इंस्टीट्यूट स्थापित किया जा रहा है। यह विश्व स्तर पर अपनी तरह का पहला संस्थान है, जहां सशस्त्र सेनाओं में अधिकारी स्तर के पदों के लिए वार्षिक 500 नौजवानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

केंद्र सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए श्री अमन अरोड़ा ने बताया कि 15-29 साल आयु वर्ग में पंजाब की बेरोजगारी दर वर्ष 2022 की 19.1 प्रतिशत से घटकर 2025 में 17 प्रतिशत हो गई है। मंत्री ने पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया कि अब पंजाब बेहतर रोजगार मैट्रिक्स वाले राज्यों में शामिल है।

वैश्विक स्तर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के समय भारत की जीडीपी चीन से थोड़ी अधिक थी। उन्होंने कहा, ”चीन ने अपने प्रत्येक व्यक्ति को काम पर लगाया और दुनिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री बनकर उभरा। चीन निकट भविष्य में अमेरिका को पछाड़ सकता है। हमारे पास वही क्षमता है, लेकिन सही वातावरण की कमी थी। पर अब हम इसे ठीक कर रहे हैं।”

कैबिनेट मंत्री ने जोर देकर कहा कि दुनिया की कोई भी सरकार प्रत्येक नागरिक को नौकरी देने की गारंटी नहीं दे सकती। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सरकार का असल कर्तव्य उद्योग और रोजगार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना होता है। उन्होंने कहा, ”हम यहां केवल आंकड़े पेश करने के लिए नहीं हैं। हम ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां हर नौजवान अपने पैरों पर खड़ा हो सके।”

विपक्ष द्वारा नौकरियों के बारे में व्हाइट पेपर जारी करने की मांग पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, ‘सबसे अच्छा, सस्ता और टिकाऊ व्हाइट पेपर लोगों से सीधे तौर पर पूछना है। आरटीआई दायर करो या लोगों के साथ मीटिंग करो। लोग खुद बताने देंगे कि उन्हें नौकरियां मिली हैं या नहीं।”

श्री अमन अरोड़ा ने पिछली कांग्रेस सरकार के ‘हर घर नौकरी’ वादे पर कटाक्ष करते हुए इसे पंजाब के नौजवानों के साथ ‘सबसे बड़ा धोखा’ बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘आप’ सरकार ने बिना किसी रिश्वत के पारदर्शी तरीके से 68000 से अधिक सरकारी नौकरियां प्रदान की हैं। उन्होंने दोहराया कि सरकार का एकमात्र उद्देश्य पंजाब को ‘कारोबार करने में आसानी’ के लिए एक मॉडल राज्य बनाना और सम्मानजनक, कौशल-आधारित रोजगार पैदा करना है।

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सियाम ने भी माना, ई-20 में ज्यादा क्लोराइड और नमी के कारण खराब हो रही गाड़ियां- केजरीवाल

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आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ई-20 को लेकर सियाम की सौंपी गई रिपोर्ट को वापस कराने पर केंद्र की मोदी सरकार को आड़े हाथ लिया है। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि सियाम (सोसायटी ऑफ इंडिया ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स) की एक रिपोर्ट आई है, जिसमें साफ़ लिखा है कि ई-20 में बहुत ज्यादा क्लोराइड और नमी है, जिससे आपकी गाड़ियां ख़राब हो रही हैं। मोदी सरकार ने सियाम पर दबाव डालकर वो रिपोर्ट वापस करवा दी। क्यों? जब विज्ञान और इंजीनियरिंग कह रहे हैं कि ई-20 ख़राब है, तो मोदी सरकार इसे देश पर जबरन क्यों थोप रही है?

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ई-20 को लेकर सियाम की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है। सियाम ने रिसर्च की और ऑटोमोबाइल के सभी मैन्युफैक्चरर्स ने मिलकर यह पाया कि क्लोराइड और मॉइस्चर ज्यादा होने की वजह से ई-20 गाड़ियों को खराब कर रहा है। सियाम ने 28 जुलाई को मोदी सरकार को यह रिपोर्ट सौंपी थी। 4 अगस्त तक केंद्र सरकार ने सियाम पर जबरदस्ती करके वह रिपोर्ट वापस करा दी। रिपोर्ट वापस करने के बाद सियाम की तरफ से कहा गया कि शायद उनकी रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ी है और कुछ तथ्यों को दोबारा चेक करने की जरूरत है। एक तरह से मोदी सरकार जबरदस्ती करके पूरे देश पर ई-20 थोप रही है, लेकिन क्यों?

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