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क्या है सर्वाइकल कैंसर (Cervical Cancer) यानी गर्भाशय के मुख्य कैंसर। कैसे करें बचाव
सर्वाइकल कैंसर हमारे देश में बहुत ज्यादा कामन है लगभग 1,00,000 महिलाएं हर साल इस कैंसर से पीड़ित होती है जिनमें से 70 हज़ार की मौत हर साल इस कैंसर की वजह से होती है हर 8 मिनट में एक महिला इस कैंसर का शिकार हो रही है तो आप समझ ही सकते हैं कि ये कितना इम्पोर्टेन्ट कैंसर है।
क्या है सर्वाइकल कैंसर (Cervical Cancer) यानी गर्भाशय के मुख्य कैंसर? आम भाषा में हम इसे कहते हैं बच्चेदानी का कैंसर भी कहते हैं।
सर्वाइकल कैंसर हमारे देश में बहुत ज्यादा कामन है लगभग 1,00,000 महिलाएं हर साल इस कैंसर से पीड़ित होती है जिनमें से 70 हज़ार की मौत हर साल इस कैंसर की वजह से होती है हर 8 मिनट में एक महिला इस कैंसर का शिकार हो रही है तो आप समझ ही सकते हैं कि ये कितना इम्पोर्टेन्ट कैंसर है।
क्या इससे बचा जा सकता है
लेकिन दुख की बात ये है कि इस कैंसर से हम आसानी बचा सकते हैं क्योंकि हमें इसका कारण पता है ये कैंसर एक वाइरस यानी human papilloma virus की वजह से होता है ये वाइरस को कैंसर में बदलने में कम से कम 10 से 15 साल लगते हैं और हमारे पास इतना समय होता है कि हम अपने आप अपने आप को इस कैंसर से बचा सके ।

किन महिलाओं को होता है सर्वाइकल कैंसर
ये इन्फेक्शन ज्यादातर उन महिलाओं में होता है जिन्होंने यौन संबंध कम उम्र में बनाने शुरू कर दिए हो या बहुत ज्यादा लोगों के साथ यौन संबंध बनाए हो यां किसी वजह से उनकी इम्युनिटी कम हो जैसे की HIV इन्फेक्शन की वजह से या बहुत ज्यादा बच्चे हो यानी गर्भाशय बार बार प्रभावित हुआ हो तो इन लोगों में ये कैंसर जल्दी होता है । आमतौर पे ये कैंसर 40 साल से उम्र की ज्यादा लेडीज में ही होता है।
क्या है लक्षण
इस कैंसर के लक्षण ज्यादातर असामान्य रक्त श्राव महीने के बीच में रक्त श्राव होना या गंदा पानी जाना या यौन संबंध बनाने के बाद रक्षा होना यही रहते हैं ज्यादातर महिलाएं इसको एक नॉर्मल श्राव समझती हैं और डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं उनको लगता है कि महीने के बीच में अगर कंधा पानी जा रहा है या रक्षा हो रहा है एक नॉर्मल कंडीशन है लेकिन ऐसा नहीं है अगर रक्त आपको सम्बन्ध बनाने के बाद या महीने के बीच में हो रहा है तो ये नॉर्मल नहीं है अगर ऐसी कुछ भी स्थिति है तो आप अपने डॉक्टर के पास जाएं और अपना चेक अप कराएं क्योंकि यह कैंसर के लक्षण हो सकते हैं और अगर आप समय पे डॉक्टर के पास जाएंगे और अपना इलाज कराएंगे तो इस कैंसर को पहली स्टेज में डायग्नोज़ किया जा सकता है और इसका इलाज साथ के साथ रोका जा सकता है।
और कैंसर ही नहीं हो सकता है ये आपको कैंसर बनने से पहले जिसको हम प्री कैंसर या Dysplasia कहते हैं उस कंडीशन में भी पकड़ पाए और उसमें तो आपका इलाज बहुत ही साधारण चीजों से हो सकता है और बच्चेदानी निकालने की या रेडिएशन कीमोथेरेपी तक जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है।
कौन सा टेस्ट करवाना होता है
इस कैंसर को डायग्नोज़ करने के लिए एक छोटा सा टेस्ट जिसको की हम बायोपिक कहते हैं उसकी जरूरत पड़ती है बायोपिक ये चेक करेगा कि ये कैंसर बना है या कैंसर से पहले की स्टेज है उसके बाद MRI या Ultrasound करके देखा जा सकता है कि बिमारी कहाँ तक फैली है बिमारी का इलाज स्टेज के हिसाब से होता है अगर बिमारी बच्चादानी तक सीमित है और पहली स्टेज में है।
ज्यादातर सर्जरी से यानी ऑपरेशन से जिसमें की बच्चेदानी निकाल दी जाती है उससे इसका इलाज पूरी तरह से हो जाता है ये ऑपरेशन थोड़ा बड़ा जरूर रहता है लेकिन 15 से 20 दिन में मरीज बिल्कुल ठीक हो जाता है और आगे किसी चीज़ की जरूरत भी नहीं पड़ती है लेकिन अगर किसी कारण वर्ष आप डॉक्टर के पास लेट पहुंचे है और बिमारी थोड़ी बढ़ गई है और बच्चेदानी से बाहर निकल चुकी है दूसरी या तीसरी स्टेज हो गई है।
तो उस स्टेज में हमें रेडिएशन थेरेपी दे सकते हैं रेडिएशन और हल्की कीमोथेरेपी से इस बिमारी को अच्छे से कंट्रोल किया जा सकता है।
इसके रिजल्ट्स बहुत अच्छे हैं और ज्यादातर पेशेंट्स बहुत अच्छे से 6070 परसेंट cases में patient बिल्कुल लंबी लाइफ अपनी जीते हैं और उनको उसके बाद ज्यादा कोई दिक्कत नहीं रहती है |
सर्वाइकल कैंसर से कैसे बचाव किया जा सकता है
इस कैंसर से हम बहुत आसानी से बच सकते हैं उसके लिए बहुत ही सिंपल टेस्ट रहते हैं जिसको कि हम Pap smear का टेस्ट कहते हैं या हम इसी वाइरस को टेस्ट कर सकते हैं यानी कि HPV यानी ह्यूमन papillomavirus infection भी टेस्ट किया जा सकता है दोनों के लिए जांच सेम रहती है यानी की जांच रहती है जो कि 12 मिनट का procedure है जिसमें कि आपके डॉक्टर आपको एक इंटरनल चेक अप करके अंदरूनी checkup से आपके अंदर से सिर्फ बच्चेदानी के मुख से हल्का सा पानी जांच करेंगे और वो पानी से हमें पता लग जाता है कि ये कैंसर है या कैंसर से पहले की स्टेज है या बहुत पहले की या सिर्फ हॉरर इन्फेक्शन ही है।
और इसको आगे इलाज की जरूरत है भी या नहीं अगर आपका और HPV बिलकुल ठीक आता है तो आपको अगले 3 से 5 साल तक कोई टेस्ट कराने की जरूरत नहीं है और अगर आपके घर में बच्चे है या आपके खुद की उम्र कम है तो आप इस कैंसर से बचने के लिए इंजेक्शन भी ले सकते हैं जिसको कि हम वैक्सीन कहते हैं HPV वैक्सीन के नाम से ही यह आती है और इसके दो या 3 ब्रांड्स मार्केट में मिलते है।
जिसके दोस्त या 3 doses लगते हैं अगर आप 15 साल से कम हैं तो दो doses से आपका काम हो जाएगा लेकिन आप 15 साल से ज्यादा हैं तो आपको इस वैक्सीन की 3 doses लेनी पड़ती हैं जो की आज फिर दो महीने बाद फिर और 6 महीने बाद के अंतर में ली जाती हैं।
ये वैक्सीन मैरिड महिलाएं यानी जिनके यौन संबंध हो चूके हैं वो महिलाएं भी ये वैक्सीन ले सकती हैं लेकिन उनमें थोड़ा सा असर कम रहता है 45 साल तक की उम्र तक ये वैक्सीन ली जा सकती है तो ये दोनों बहुत ही सिंपल टेस्ट है यानी HPV टेस्टिंग और वैक्सीनेशन जिससे आप एक बहुत बड़ी बिमारी से बच सकते हैं
ऑस्ट्रेलिया में आज कैंसर खत्म हो चुका है |
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Single Parenting: भारत में एक चुनौती या समानता का प्रतीक?
क्या भारत में Single Parent होना एक बड़ी चुनौती है? यह एक सवाल है जिस पर अधिकांश लोगों के मत अलग-अलग हो सकते है। Single Parenting एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
क्या भारत में Single Parent होना एक बड़ी चुनौती है? यह एक सवाल है जिस पर अधिकांश लोगों के मत अलग-अलग हो सकते है। Single Parenting एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। समाज में सिंगल पेरेंट की स्थिति कई तरह के प्रश्न उठाती हैं, जैसे कि वह अपने बच्चे की देखभाल कैसे करेगा, फाइनेंशियल सपोर्ट कहाँ से प्राप्त करेगा, और सामाजिक और मानसिक समर्थन कैसे प्राप्त करेगा।
Single Parenting में आने वाली चुनौतियां
- सिंगल पेरेंटिंग एक अनूठा सफर है, जिसमें चुनौतियां और जिम्मेदारियां दोनों का ही सामना एक अकेले पेरेंट को करना पड़ता है।
- फाइनेंस: सिंगल पेरेंट के लिए वित्तीय स्थिति को संतुलित रखना बड़ी चुनौती हो सकती है। एक ही आय स्रोत से घरेलू खर्चों को पूरा करना और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखना मुश्किल हो सकता है।
- बच्चों का लालन-पालन: बच्चों को संभालना, उनकी शिक्षा, और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना यह सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है।
- देखभाल: जिंदनी में किसी का साथ न होना और अकेले ही बच्चे की देखभाल करना, ऊपर से दोहरी जिम्मेदारियों का दबाव बना रहता है।
- रोल मॉडलिंग: सिंगल पेरेंट को अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल और उनका आदर्श बनना होता है। उन्हें आदर्शों और मूल्यों को सिखाने के लिए सक्षम होना पड़ता है।
- बच्चों में सुरक्षा: बच्चों की सुरक्षा और उनकी चिंता एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। उन्हें सुरक्षित रखना और उनकी चिंता करना सिंगल पेरेंट के लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
जिम्मेदारियों और संघर्षों का सामना
- माता या पिता की मृत्यु: यह सबसे दुखद कारण है जिस वजह सिंगल ही परिवार को चलाना पड़ता है। घर में माता या पिता की मृत्यु के बाद, बच्चों को अकेले पालने में एक अभिभावक को कई जिम्मेदारी का सामना करना पड़ता है।
- माता-पिता के बीच अलगाव या तलाक: बच्चे के जन्म के बाद, माता-पिता के बीच किसी कारण तलाक या अलगाव की स्थिति सिंगल पेरेंट बनने का कारण बनती है।
- माता-पिता द्वारा परित्याग: कभी-कभी काम काज की वजह से बच्चों के माता-पिता अपने परिवार को छोड़ जाते हैं, इससे किसी एक अभिभावक पर बच्चों की जिम्मेदारी आ जाती है।
- रोज़गार की तलाश और प्रवास: आजकल के भागमभाग जीवन में, लोग अक्सर अपने रोज़गार के लिए अन्य शहरों या देशों में जाना पसंद करते हैं। ऐसे मामलों में, एकल-माता या पिता अपने बच्चों को पीछे छोड़ जाते हैं।
- व्यक्तिगत चुनौतियाँ: कभी-कभी किसी व्यक्ति ने स्वयं सिंगल पेरेंट बनने का चुनाव किया होता है, जैसे गोद लेना, IVF, आदि। ऐसे मामलों में, बच्चों को सिंगर पेरेंट द्वारा पाला जाता है।
सिंगर पेरेंट रिटायरमेंट के लिए बनाएं फाइनेंशियल प्लान
अकेले पैरेंट्स के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग बनाना और उन्हें कार्रवाई में लाना वास्तव में एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। इस संदर्भ में, म्युचुअल फंड में निवेश करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है जो उन्हें उनके आर्थिक परेशानियों से निकलने में मदद करेगा।
विशेष रूप से, सिंगल पैरेंट्स के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा और अन्य आर्थिक जरूरतों के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपने भविष्य की भी देखभाल करनी चाहिए। म्युचुअल फंड्स इसके लिए एक सुगम और सुरक्षित विकल्प हैं। यह अच्छा होगा है कि पैरेंट्स स्वयं या एक वित्तीय सलाहकार से बात करें ताकि वे अपनी वित्तीय योजनाओं को सही दिशा में ले सकें।
भारत में 13 मिलियन सिंगल मदर्स
एकल माताओं का संघर्ष और सम्मान हमें सोचने पर मजबूर करता है कि किस प्रकार से उनका योगदान हमारी समाज में अद्वितीय है। सिंगल मदर जो अकेले होती हैं और अपने बच्चों के पलन-पोषण, शिक्षा, और परिवारिक जीवन की जिम्मेदारियों का सम्मान करती हैं, वास्तव में समाज के रचनाकारों में से एक हैं। भारत में लगभग 13 मिलियन ऐसी माताएं हैं जो अपने बच्चों का पालन-पोषण संभालती हैं, जो भारतीय परिवारों का लगभग 4.5% है।
विश्व भर में, ज्यादातर सिंगल मदर अपने घरों का नेतृत्व करती हैं, जो अक्सर समाज के अनदेखे क्षेत्रों में काम करती हैं। वे न केवल अपने बच्चों को पालन-पोषण कर रही हैं, बल्कि , बुजुर्गों की देखभाल, और घरेलू काम भी करती है। इसके अलावा, वे बाहरी काम करके अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
समाज में सिंगल पेरेंटिंग की स्थिति को समझने में, हमें इसके साथ साथ उन अकेले देखभाल कर रहे माताओं और पिताओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी महसूस करना चाहिए, जो अपने बच्चों के साथ निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने न केवल अपने परिवार को संभाला है, बल्कि समाज को भी एक सकारात्मक योगदान दिया है।
सिंगल पेरेंटिंग एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन इसके साथ ही यह समानता का प्रतीक भी है, जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए, हमें समाज में सिंगल पेरेंटिंग को समझने और समर्थन करने की आवश्यकता है, ताकि हम एक साथ मिलकर एक समृद्ध और सहयोगी समाज की दिशा में अग्रसर हो सकें।
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Mental Health: एक महत्वपूर्ण चुनौती जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए
शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखना जरूरी है, यह बिल्कुल सही है। हमारे शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखने से हम बीमारियों से बच सकते हैं, ऊर्जा बढ़ा सकते हैं और एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। लेकिन, क्या हम यह भूल रहे हैं कि हमारी मानसिक स्वास्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखना जरूरी है, यह बिल्कुल सही है। हमारे शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखने से हम बीमारियों से बच सकते हैं, ऊर्जा बढ़ा सकते हैं और एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। लेकिन, क्या हम यह भूल रहे हैं कि हमारी मानसिक स्वास्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
मानसिक स्वास्थ न केवल हमारे दिमाग की सेहत को संतुलित रखता है, बल्कि यह हमारे जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। एक स्वस्थ मानसिक स्थिति में हम स्ट्रेस को संभाल सकते हैं, संवेदनशीलता को विकसित कर सकते हैं और सकारात्मक भावनाओं के साथ अपने जीवन को भर सकते हैं।
हालांकि, दुःख की बात यह है कि हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ और मानसिक पीड़ा को बहुत कम महत्व दिया जाता है। बहुत से लोग मानसिक स्वास्थ के मुद्दों को अनदेखा करते हैं, जिससे वे संभावित रोगों या संकटों से घिरे रहते है।
मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरुकता
मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा करना जरूरी है, क्योंकि यह हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। हम सभी कभी-कभी तनाव, चिंता, उदासी, या दिक्कतों का सामना करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हम कमजोर हैं, बल्कि यह हमारी मानसिक मजबूती का परिचय कराता है।
मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए, हमें अपने अंदर की बातों को सुनना और समझना जरूरी है। हमें अपने मन की सेहत को सकारात्मक रखना चाहिए। समाज में ऐसे माहौल को बनाना होगा जहां हर कोई अपने दिल की बात कह सके। यह समाज के लिए हम सभी की जिम्मेदारी है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है भेदभाव
भेदभाव न केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। इसे खत्म करने के लिए, हमें समाज में धार्मिक, जातिगत, लिंगीय और अन्य भेदों के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।
पहले, बात करें लैंगिंग और जेंडर भेदभाव के बारे में। जब हम लोगों को उनके लिंग, जाति, या सेक्सुअल पहचान के आधार पर निर्धारित करते हैं, तो हम उन्हें एक स्थिति में प्रतिबद्ध कर देते हैं। इसका परिणाम होता है मानसिक तनाव, अवसाद, और अकेलापन।
देखा जाए तो अक्सर लड़कियों, थर्ड जेंडर या गे, होमो सेक्सुअल आदि को लिंगभेद की वजह से मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। स्कूल, दफ्तर या सोसाइटी में भी किसी खास वर्ग को अपमान या नीचा दिखाने से भी वो वर्ग मानसिक समस्याओं से गुजरता है। जिसका आप और हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।
इसके अतिरिक्त, सामाजिक बहिष्कार और विभाजन भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। जब हम एक विशेष ग्रुप के सदस्य को उनकी पहचान के कारण बाहर कर देते हैं, तो उन्हें असुरक्षित और असमान महसूस हो सकता है। इससे उनका आत्मसम्मान कम होता है और वे अपनी मानसिक स्वास्थ्य के साथ समस्याएं झेल सकते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या
मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ 14 साल की उम्र में शुरू होती हैं और 75% मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ 24 साल की उम्र में विकसित होती हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या अभी नया विषय है, जिसका सामना हमें संयमित और प्रभावी रूप से करना होगा। मानसिक स्वास्थ्य की गंभीरता को समझने के लिए, हमें उसकी जड़ को समझना होगा, ताकि हम समाज में को सुधार सकें और उसे सही दिशा में ले सकें। देश में लाखों लोग मानसिक विकारों से पीड़ित हैं, जो उनके और उनके परिवार के लिए अत्यंत अधिक परेशानी और पीड़ा का कारण बनते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मूल कारण बहुत सारे हो सकते हैं, जैसे दिनचर्या में बदलाव, दैनिक तनाव, जीवन में असमंजस, और भारी दवाओं का अनुप्रयोग। साथ ही, सामाजिक परिस्थितियों का भी असर होता है, जैसे वित्तीय समस्याएं, अलगाव, ब्रेकअप आदि। WHO के आँकड़े बताते है कि भारत में प्रति लाख लोगों पर आत्महत्या की औसत दर 10.9 है ।
मानसिक स्वास्थ के लिए इंश्योरेंस कंपनी
- HDFC ERGO
- Reliance’s Health Infinity Insurance Policy
- ICICI Lombard
- Loop Health
- Aditya Birla Health Insurance
- Niva Bupa Health Insurance
मानसिक बीमारियों की समस्या का हल हम सभी की जिम्मेदारी है। हमें समाज में सामान्यत: स्वीकृत और समानिता की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। मानसिक स्वास्थ को बनाए रखना सिर्फ एक सेहतमंद जीवन का पहला कदम नहीं है, बल्कि यह एक खुशहाल और समृद्ध समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए, सकारात्मक सोच, संतुलित जीवनशैली, और स्वस्थ रिश्तों का होना हमारे मानसिक स्वास्थ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये हमें जीवन के हर क्षण को आनंदमय और संतुष्ट बनाए रखने में मदद करते।
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Food Waste: 20% भोजन कचरे में, दुनिया में 80 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे
Food Waste: दुनिया में, जहां लाखों लोग रात को भूखे पेट सोते हैं, उसमें यह स्वीकार करना दुःखद है कि हम लगभग 100 मिलियन टन Food को हर दिन waste कर रहे हैं। यह चौंकाने वाला आंकड़ा हमारी वैश्विक खाद्य प्रणाली में एक गंभीर असंतुलन को प्रकट करता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा जारी ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024’ ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में भोजन का लगभग 20 फीसदी का भाग कचरे में फेंक दिया जाता है। यह बात चिंताजनक है कि एक तरफ भूखे लोगों की संख्या बढ़ रही है, तो दूसरी ओर हम अनावश्यक रूप से खाने लायक भोजन को फेंक रहे हैं।
60 फीसदी खाना घरों में होता है बर्बाद
‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024’ की रिपोर्ट की बात करें तो विश्व स्तर पर खाद्य पदार्थों की अधिकांश बर्बादी हमारे घरों में हो रही है, इस बर्बादी की कुल मात्रा लगभग 63.1 करोड़ टन है, जिसमें से अधिकांश, यानी 60 फीसदी, घरों में बर्बाद हो रहा है। इसी तरह, खाद्य सेवा क्षेत्र में 29 करोड़ टन और फूटकर सेक्टर में 13.1 करोड़ टन खाद्य उत्पादों की बर्बादी हो रही है। आंकड़ों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए सालाना औसतन 79 किलो खाने की बर्बादी हो रही है।
Food Waste–भारत में हर साल 7.8 करोड़ टन से ज्यादा
भारतीय समाज में भोजन की महत्वता अत्यधिक है, लेकिन क्या हम इस तरफ ध्यान दे रहे हैं? रिपोर्टों ने दिखाया कि भारत में फूड वेस्ट की मात्रा बड़ी है, जबकि कई लोगों को कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। भारत में फूड वेस्ट की मात्रा बड़ी है, जबकि कई लोगों को कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है।
2021 में जारी ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति बर्बाद किए जा रहे भोजन का आंकड़ा सालाना 50 किलोग्राम था। इस आंकड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा घरों में हो रहे फूड वेस्ट है। ये सोचने वाली बात है कि एक ओर जब दुनिया में भूखमरी और अनाज की कमी के मुद्दों पर बात हो रही है और दूसरी ओर इतने बड़े पैमाने पर भोजन की बर्बादी हो रही है।
‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, 74.1 फीसदी भारतीयों के लिए पोषण से भरी थाली किसी लक्जरी से कम नहीं है। यह संकेत है कि इतने प्रयासों के बावजूद भी खाने की कमी का सामना करना पड़ रहा है। 2023 ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, देश की 16.6 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में कुपोषण का शिकार है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। एक ओर भारत में खाद्य पदार्थों की बर्बादी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग भोजन के अभाव से जूझ रहे हैं।
पर्यावरण और जलवायु पर पड़ रहा बुरा असर
दरअसल, गर्म देशों की जलवायु गर्म होने के कारण ज्यादा भोजन बर्बाद होता है क्योंकि वहाँ रेफ्रिजरेशन कम होता है, जिससे खाद्य को सुरक्षित रखने में परेशानी होती है जिससे खाना जल्दी खराब होता है। गर्म तापमान और लू के कारण भोजन को सुरक्षित ढंग से रखना मुश्किल हो जाता है, जिससे बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद होता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ जाता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है।
खाद्य बर्बादी और नुकसान 10% वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है, जो विमानन क्षेत्र में कुल उत्सर्जन का पाँच गुणा है। इस पर ध्यान देते हुए, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने खाद्य बर्बादी से उत्सर्जन कम करने की मांग की है।
खाने की बर्बादी के लिए जिम्मेदार कौन?
2022 में एक अध्ययन के अनुसार 28% खाना बर्बाद करने के लिए रेस्तरां, होटल, और कैंटीन जिम्मेदार थे, लेकिन सबसे ज्यादा खाने की बर्बादी लोगों के घरों में होती है। खाने की बर्बादी के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मुख्य कारण उसकी एक्सपाइरी डेट होती है। ऐसे में हमें खाने को फेंकने के बजाय उसे इस्तेमाल करने का तरीका सिखाना चाहिए।
खाने की बर्बादी में गरीब और अमीर देश एक समान
यह सत्य है कि भोजन की बर्बादी की समस्या दुनिया भर में है, और यह न केवल गरीब देशों की समस्या है, बल्कि अमीर देशों में भी इसकी वही स्थिति है। यूएनईपी के अनुसार, खाने की बर्बादी का स्तर उच्च, उच्च मध्यम, और निम्न मध्यम आय वाले देशों में समान है। समस्या का समाधान केवल साझेदारी, संयुक्त प्रयास, और सहायता से हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि खाद्य अपशिष्टता के समाधान में सभी का सहयोग आवश्यक है, चाहे वह अमीर हों या गरीब।
ध्यान देने वाली बात यह है कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी वैश्विक समस्या है, इससे भोजन तो बर्बाद हो ही रहा है बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता और प्रदूषण जैसी समस्याओं को भी बढ़ावा मिलता है। हमें इसे ध्यान में रखकर समाधान की ओर कदम बढ़ाना होगा। अगर हम खाद्य पदार्थों की बर्बादी क्यों हो रही है इस पर ध्यान दें तो हम खाद्य की व्यर्थ और बर्बादी को कम कर सकते हैं। इससे हम जलवायु परिवर्तन और आर्थिक हानि को भी कम कर सकते हैं।
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