Punjab
CM भगवंत सिंह मान ने बढ़ते केंद्रीकरण और शैक्षिक असमानता की चिंताओं को लेकर केंद्र से उच्च शिक्षा विधेयक पर पुनर्विचार करने की अपील की
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने प्रस्तावित ‘विकसित भारत शिक्षा अधिनियम विधेयक, 2025’ (उच्च शिक्षा विधेयक) का जोरदार विरोध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कानून उच्च शिक्षा को और महंगी बना सकता है, आम परिवारों के विद्यार्थियों के लिए अवसरों को कम कर सकता है और स्थानीय शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने की राज्यों की क्षमता को खोखला कर सकता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे एक पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र से इस विधेयक पर पुनर्विचार करने और ऐसे सुधारों को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श करने की अपील की है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकते हैं।
देश भर के करोड़ों माता-पिता के अपने बच्चों की शिक्षा पर उम्मीदें और सपने टिकाए रखने का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा किसी किसान, मजदूर या दुकानदार के बच्चे के लिए अवसरों का मार्ग होनी चाहिए, न कि परिवारों पर आर्थिक बोझ। उन्होंने दावा किया कि भारत की प्रगति उच्च शिक्षा को विश्वविद्यालयों, बुनियादी ढांचे, फैकल्टी और अनुसंधान में अधिक निवेश के माध्यम से अधिक सुलभ और किफायती बनाने पर निर्भर करती है, न कि ऐसे उपायों पर जो लागतों को बढ़ाते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण करते हैं।
अपने पत्र में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने लिखा कि वे न केवल पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में बल्कि भारत भर के उन करोड़ों माता-पिता के प्रतिनिधि के रूप में लिख रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी उम्मीदें उनके बच्चों की शिक्षा से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा, “हर परिवार चाहता है कि उसका बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, अपने पैरों पर खड़ा हो, सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करे और देश की प्रगति में योगदान दे। इसी कारण शिक्षा केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं है, यह भारत के उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा सवाल है।”
मुख्यमंत्री ने कहा, “मुझे शुरू में उम्मीद थी कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता, जवाबदेही और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा। हालांकि विधेयक का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुझे गंभीर खतरा है कि यह उच्च शिक्षा से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णयों का केंद्रीकरण करने की कोशिश करता है, जिसके विद्यार्थियों, शिक्षकों, विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।”
अपनी पहली बड़ी चिंता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यह विधेयक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने की बजाय सत्ता के केंद्रीकरण पर अधिक केंद्रित प्रतीत होता है। उन्होंने कहा, “किसी भी शिक्षा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं को कितने प्रभावी ढंग से समझती है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में हर राज्य को अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि उच्च शिक्षा के बारे में किसी कानून से यह उम्मीद करना स्वाभाविक था कि वह गुणवत्ता, अनुसंधान, नवाचार, रोजगार योग्यता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करेगा। हालांकि विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा लगता है कि इसका मुख्य उद्देश्य नीति निर्माण की शक्तियों, मानकों, नियमों, मान्यता प्रणालियों और अपीलीय शक्तियों को केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करना है। उन्होंने कहा, “शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए जहां न्यूनतम राष्ट्रीय मानक आवश्यक हो सकते हैं, वहीं राज्यों को अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार प्रणालियां विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक उस संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता प्रतीत होता है।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आगे कहा कि उनकी चिंता केवल राज्यों के अधिकारों की नहीं, बल्कि करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य की भी है। उन्होंने कहा, “भारत का हर राज्य अलग-अलग चुनौतियों से जूझ रहा है। कोई बेरोजगारी से निपट रहा है, कोई कौशल विकास, औद्योगिक आवश्यकताओं या प्रवासन से जूझ रहा है। पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्यों को इससे भी अधिक जटिल वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है।”
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य सरकारें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के माध्यम से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम, कौशल कार्यक्रम, औद्योगिक साझेदारी और रोजगारोन्मुखी पहलकदमियां विकसित करती हैं। उन्होंने कहा, “यदि शिक्षा के अधिकांश निर्णय दिल्ली में बैठी संस्थाओं द्वारा लिए जाएंगे तो राज्य धीरे-धीरे स्थानीय वास्तविकताओं को समझने और उसके अनुसार समाधान तैयार करने की अपनी क्षमता खो देंगे। परिणामस्वरूप, उच्च शिक्षा के केंद्रीकृत होने और इसकी व्यावहारिक महत्ता समाप्त होने का खतरा है।”
बढ़ते केंद्रीकरण के खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) जैसी केंद्रीय संस्थाओं के कामकाज का हवाला दिया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में परीक्षा प्रबंधन, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। जब केंद्रीय संस्थाएं स्वयं ऐसी चुनौतियों से जूझ रही हैं तो यह पूछना बिल्कुल उचित है कि क्या उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करना सचमुच सही दिशा है।”
मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच अधिक सहयोग ही बेहतर रास्ता है। उन्होंने कहा, “विभिन्न राज्यों द्वारा विकसित किए गए सफल मॉडलों को पूरे देश में साझा किया जाना चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक सहभागी और सहयोगात्मक होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश यह विधेयक विपरीत दिशा में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने यह चिंता भी व्यक्त की कि प्रस्तावित कानून उच्च शिक्षा को और अधिक महंगा बना सकता है। उन्होंने सवाल किया, “विधेयक का अध्ययन करते समय मेरे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरा। यदि अधिकांश शक्तियां केंद्र सरकार के पास केंद्रित हो जाती हैं, यदि राज्य सरकारों की भूमिका लगातार सीमित होती जाती है और यदि राज्य विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों पर केंद्रीय नियामक नियंत्रण बढ़ता है, तो इन संस्थानों के संचालन और विकास के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे?”
मुख्यमंत्री ने संकेत दिया कि विधेयक इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देता। उन्होंने कहा, “यदि निर्णय लेने की शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाता है, जबकि आवश्यक वित्तीय सहायता की कोई गारंटी नहीं है, तो विश्वविद्यालयों पर अनिवार्य रूप से राजस्व बढ़ाने का दबाव पड़ेगा। इससे फीस में वृद्धि हो सकती है, स्व-वित्तपोषित (सेल्फ-फाइनेंस्ड) पाठ्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ सकती है और निजी निवेश पर निर्भरता भी बढ़ सकती है।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने चेतावनी दी कि ऐसे मॉडल का सबसे अधिक बोझ मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “उच्च शिक्षा अवसरों का एक माध्यम होनी चाहिए। यह ऐसा विशेषाधिकार नहीं बनना चाहिए, जो केवल उन्हीं को उपलब्ध हो जो इसका खर्च उठा सकते हैं।”
मुख्यमंत्री ने उच्च शिक्षा के धीरे-धीरे हो रहे निजीकरण को लेकर भी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, “विधेयक का अध्ययन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को धीरे-धीरे ऐसे मॉडल की ओर धकेला जा सकता है, जहां सरकारी संस्थान कमजोर हो जाएंगे और निजी क्षेत्र पर निर्भरता लगातार बढ़ती जाएगी।”
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नीति निर्माण, नियमों और नियंत्रण का पूर्ण केंद्रीकरण बिना किसी स्पष्ट वित्तीय जिम्मेदारी के किया जाता है, तो सरकारी विश्वविद्यालयों को निजी संस्थानों और निजी पूंजी पर निर्भर होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “ऐसे बदलाव का सीधा प्रभाव लाखों विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता उन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए लगातार बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दे रहे हैं।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जोर देकर कहा कि भारत जैसे देश में उच्च शिक्षा को आर्थिक बाधाओं से सीमित करने के बजाय एक अधिकार के रूप में मजबूत किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह इस विधेयक के वर्तमान स्वरूप को वापस ले और इसकी व्यापक समीक्षा करे। उन्होंने कहा, “भारत को ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं है, जो उच्च शिक्षा का और अधिक केंद्रीकरण करे। हमें ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जो विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को उनके क्षेत्रों, उद्योगों, समाजों और युवाओं की आवश्यकताओं से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की अनुमति दे।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि उच्च शिक्षा की अधिकांश संस्थाएं राज्य सरकारों द्वारा स्थापित, संचालित और वित्तीय रूप से समर्थित होती हैं। इसलिए सुधारों को ऐसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जो राज्यों को अधिक अधिकार, अधिक लचीलापन और अधिक जिम्मेदारी प्रदान करे। उन्होंने कहा, “राज्यों को अपने युवाओं की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शैक्षणिक प्रणालियां विकसित करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही केंद्र सरकार को नियामक नियंत्रण बढ़ाने के बजाय उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।”
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेंट रेशो )को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा, “उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी संस्थानों को अधिक संसाधनों, मजबूत बुनियादी ढांचे, आधुनिक प्रयोगशालाओं, गुणवत्तापूर्ण फैकल्टी और आवश्यक अनुसंधान निधियों की आवश्यकता है। उन्हें नियंत्रण की अतिरिक्त परतों की आवश्यकता नहीं है।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाना चाहती है, तो उसे प्रशासनिक केंद्रीकरण की बजाय शैक्षणिक निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालयों को अतिरिक्त नियंत्रण देने के बजाय संसाधन, स्वायत्तता और अवसर दिए जाने चाहिए। यह केवल केंद्र-राज्य संबंधों का प्रश्न नहीं है। यह करोड़ों विद्यार्थियों, उनके परिवारों और भारत के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्रगति आम परिवारों के सपनों को साकार करने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा, “जब किसी किसान का बेटा इंजीनियर बनता है, जब किसी मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है और जब किसी छोटे दुकानदार का बच्चा वैज्ञानिक बनता है, तब भारत आगे बढ़ता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसे सपनों को साकार करना आसान बनाना चाहिए, न कि अधिक कठिन।”
अपनी अपील दोहराते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने केंद्र सरकार से विधेयक वापस लेने और इसके स्थान पर ऐसा ढांचा लाने की मांग की, जो शिक्षा को अधिक सुलभ, किफायती, उच्च गुणवत्ता वाली और राज्यों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा, “देश शिक्षा पर नियंत्रण करके महान नहीं बनते। देश शिक्षा में निवेश करके महान बनते हैं।”
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अमृतसर में पुलिस-बदमाश मुठभेड़, गोली लगने के बाद 2 आरोपी गिरफ्तार
पंजाब सरकार ने निजी स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी फीस वृद्धि पर रोक लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में एक महत्वपूर्ण अध्यादेश को मंजूरी दी गई, जिसके तहत अब राज्य के निजी स्कूल हर साल 5 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकेंगे।
कैबिनेट बैठक के बाद वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि सरकार का उद्देश्य अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से राहत देना और शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि नए नियमों के लागू होने के बाद फीस वृद्धि को नियंत्रित किया जाएगा और निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगेगा।
शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने कहा कि सरकार अभिभावकों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने जानकारी दी कि जिन निजी स्कूलों ने पिछले तीन वर्षों के दौरान 15 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाई है, उनसे वसूली गई अतिरिक्त राशि अभिभावकों को वापस करवाई जाएगी।
सरकार ने नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भी प्रावधान किया है। नए नियमों के तहत प्राथमिक स्कूलों पर 50 हजार रुपये तक, हाई स्कूलों पर 2 लाख रुपये तक और वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों पर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा।
पंजाब सरकार का कहना है कि यह फैसला लाखों अभिभावकों को राहत देने वाला साबित होगा। साथ ही शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी तथा शिक्षा को व्यवसाय बनाने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।
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बादल परिवार के काले कारनामे एक-एक करके जनता के सामने लाए जाएंगे और उन्हें उनके पापों की मिसाली सजा मिलेगी : CM भगवंत सिंह मान
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आज कहा कि पंजाब के लोग यह नहीं भूले हैं कि किस तरह बादल परिवार और अकाली नेतृत्व ने बार-बार प्रदेश के हितों से समझौता किया, तीन काले कृषि कानूनों का समर्थन किया, राजनीतिक लाभ के लिए धर्म का दुरुपयोग किया और पंजाब में नशे के कलंक को पनपने दिया। फरीदकोट के गांव पंजगराईं कलां में ‘लोक मिलनी’ कार्यक्रम के दौरान लोगों से रूबरू होते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि पिछली सरकारों ने जहां पंजाब को नशे, बेरोजगारी और पतन की ओर धकेला, वहीं ‘आप’ सरकार नशा तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, पारदर्शी सरकारी भर्ती, शिक्षा में ऐतिहासिक सुधार, सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं और महिलाओं के हित वाली कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से प्रदेश की तस्वीर बदल रही है।
मुख्यमंत्री ने दावा किया कि पंजाब और इसके लोगों के साथ विश्वासघात करने वालों का हर करतूत जनता के सामने लाया जाएगा, जबकि मौजूदा सरकार एक स्वस्थ, शिक्षित और समृद्ध पंजाब के निर्माण की दिशा में पूरी तरह से केंद्रित है। सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान, जिनके साथ पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां भी मौजूद थे, ने कहा कि बादल परिवार ने प्रदेश पर लंबे समय तक शासन किया है और हमेशा प्रदेश को कमजोर करने की साजिशें रची हैं। उन्होंने कहा, “बादलों का एकमात्र एजेंडा प्रदेश और इसके लोगों के हितों से समझौता करके अपने निजी हितों को सुरक्षित करना रहा है। ये ऐसे अवसरवादी नेता हैं, जो अपने निजी और राजनीतिक हितों के अनुसार गिरगिट की तरह रंग और रुख बदलते हैं।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोगों ने अकालियों को चुना था लेकिन वे गद्दार साबित हुए और उन्होंने हमेशा प्रदेश और इसके लोगों की पीठ में छुरा घोंपा। भगवंत सिंह मान ने कहा, “जब पूरी किसानी अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी, तब अकालियों ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी कुर्सियां बचाने के लिए मोदी सरकार के काले कृषि कानूनों का समर्थन किया था। अकालियों ने अपने राजनीतिक हितों के लिए धर्म का दुरुपयोग किया और लोग इसके लिए उन्हें कभी माफ नहीं कर सकते।”
एक और मिसाल देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इन नेताओं ने खुद को किसान बताकर लंबे समय तक लोगों को बेवकूफ बनाया है। उन्होंने कहा, “उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि कोई अन्नदाता बसों का इतना बड़ा काफिला और गुड़गांव में आलीशान होटल कैसे बना सकता है। यह सारी संपत्ति इसलिए इकट्ठी की गई है क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक हितों के लिए प्रदेश और लोगों के हितों को बेच दिया।”
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि अकाली, पीढ़ियों के घात के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि नशा तस्करी को उनका संरक्षण प्राप्त थी और यह उनके लंबे कुशासन के दौरान पनपी-फूली। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन नेताओं के हाथ उन लाखों युवाओं के खून से रंगे हैं, जो नशे की भेंट चढ़ गए, जिसकी सप्लाई प्रदेश में सरकारी गाड़ियों के माध्यम से की जाती थी। उन्होंने कहा, “इन नेताओं के पाप क्षमा करने योग्य नहीं हैं और लोग इनके बुरे करतूतों की लंबी दास्तान के लिए इन्हें कभी भी माफ नहीं कर सकते। बेअदबी के जिम्मेदार लोग श्री अकाल तख्त साहिब पर पेश हुए और सार्वजनिक रूप से अपना गुनाह कबूल किया।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि जब उनकी राजनीतिक इच्छाएं पूरी नहीं हुईं तो उन्होंने यू-टर्न ले लिया। भगवंत सिंह मान ने कहा, “पूरा प्रदेश इन नेताओं का असली चेहरा जानता है, जिन्होंने हमेशा राजनीतिक हथकंडों के माध्यम से लोगों को गुमराह किया है। इन नेताओं ने गैंगस्टरों की पीठ थपथपाई और नशा तस्करों को पनाह देकर पंजाब के युवाओं की रगों में नशा घोला। लोग अकालियों को उनके पापों के लिए कभी माफ नहीं करेंगे और एक बार फिर उन्हें सबक सिखाएंगे। लोगों ने बार-बार उन्हें चुना, लेकिन उन्होंने बार-बार पंजाब और इसके लोगों के साथ विश्वासघात किया।” मुख्यमंत्री ने दोहराया कि अकालियों ने अपने राजनीतिक हितों के लिए धर्म का दुरुपयोग किया, इसलिए लोग उन्हें कभी माफ नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा कि स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल ने भी सुखबीर सिंह बादल को कभी भी प्रदेश का मुखिया नहीं बनाया क्योंकि वे जानते थे कि पूर्व उपमुख्यमंत्री पंजाब को मुसीबत में डाल देंगे। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि सुखबीर सिंह बादल जमीनी हकीकतों से वाकिफ नहीं हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी आराम-ओ-आइश और खुशहाली वाले सुरक्षित माहौल में गुजारी है।
उन्होंने कहा कि सुखबीर सिंह बादल को प्रदेश की बुनियादी भौगोलिक स्थिति का भी पता नहीं है लेकिन फिर भी वे पंजाब में राजनीतिक सत्ता पाना चाहते हैं। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “बाकी बातें तो एक तरफ रहीं, पूर्व उपमुख्यमंत्री पंजाब की बुनियादी फसलों में भी अंतर नहीं कर सकते क्योंकि वे प्रदेश के मुख्य मुद्दों से ही पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं। दूसरी तरफ पंजाब सरकार ने प्रदेश की भलाई और लोगों की खुशहाली सुनिश्चित करने के लिए अनेकों पहलें की हैं।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह बहुत गर्व और संतुष्टि की बात है कि पंजाब सरकार ने युवाओं को 67,500 से अधिक सरकारी नौकरियां प्रदान की हैं। उन्होंने आगे कहा, “पंजाब में भ्रष्टाचार और पक्षपात का युग खत्म हो गया है। आज युवाओं को निर्धारित योग्यता के आधार पर पारदर्शी तरीके से नौकरियां मिल रही हैं। सरकार पंजाबियों की उम्मीदों पर खरी उतर रही है और प्रदेश का एक-एक पैसा इसके लोगों के विकास पर खर्च किया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि पहली बार कोई मुख्यमंत्री सिर्फ मंच से बोलने के बजाय खुलकर बातचीत करके आम लोगों की बातें सुन रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार सरकारी खजाने के एक-एक पैसे का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए कर रही है।
उन्होंने कहा कि पंजाब के 90 प्रतिशत से अधिक घरों को मुफ्त बिजली मिल रही है और किसानों को दिन के समय बिजली मिल रही है, जो मिसाली कदम है।
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि ऐसे समय में जब देश की संपत्ति केंद्र सरकार द्वारा अपने करीबी दोस्तों को मामूली कीमतों पर सौंपी जा रही है, पंजाब सरकार ने एक निजी थर्मल प्लांट खरीदकर इसका नाम श्री गुरु अमरदास जी के नाम पर रखकर इतिहास रचा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोगों को व्यापक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए पंजाब सरकार ने मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना शुरू की है, जो देश की अपनी तरह की पहली योजना है जो पंजाब के प्रत्येक निवासी परिवार को 10 लाख रुपये तक का नकद रहित चिकित्सा उपचार प्रदान करती है। उन्होंने आगे कहा, “पंजाब ऐसा व्यापक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करने वाला पहला भारतीय राज्य है, जिससे परिवारों पर वित्तीय बोझ कम हुआ है और मानक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जा रही हैं।” मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि इस ऐतिहासिक पहल का उद्देश्य प्रदेश के सभी परिवारों को व्यापक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करना है और लोग इस योजना के तहत पहले ही 650 करोड़ रुपये से अधिक का मुफ्त इलाज प्राप्त कर चुके हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मांवां-धीयां सत्कार योजना के तहत, 1 जुलाई से 18 साल से अधिक उम्र की महिला लाभार्थियों को वित्तीय सहायता के बारे में उनके मोबाइल फोन पर सूचना मिलेगी। उन्होंने आगे कहा, “अन्य सभी वर्गों से संबंधित महिलाओं को 1,000 रुपये प्रति माह मिलेंगे, जबकि अनुसूचित जाति की महिलाओं को 1,500 रुपये प्रति माह मिलेंगे। यह फंड सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाएंगे और पहले से ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्राप्त कर रही महिलाएं भी इस योजना का लाभ लेने की पात्र होंगी।” मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि पंजाब की 97 प्रतिशत महिलाओं को इस योजना से लाभ होने की उम्मीद है और प्रदेश सरकार ने इसके लिए बजट में 9,300 करोड़ रुपये रखे हैं।
इस योजना के व्यापक सामाजिक महत्व पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि भले ही यह वित्तीय सहायता महिलाओं को अमीर नहीं बना सकती लेकिन यह उन्हें बनता सम्मान और सत्कार जरूर प्रदान करेगी। उन्होंने कहा, “महिलाएं सबसे अधिक सम्मान की हकदार हैं क्योंकि वे जीवन का आधार हैं। माताओं और बहनों के आशीर्वाद में दुनिया की हर चुनौती को पार करने की ताकत होती है।” मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि लिंग समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक तथा आर्थिक निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना बहुत जरूरी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वे ईश्वर के बहुत आभारी हैं कि अकाल पुरख ने उन्हें जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार संशोधन अधिनियम, 2026 को लागू करने का अवसर दिया। उन्होंने कहा कि जब भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की घटनाएं हुईं, लाखों लोगों के दिल दहल गए। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि ईश्वर ने उन्हें बुद्धि और बल प्रदान किया तभी वे कानूनी विशेषज्ञों के साथ उचित विचार-विमर्श के बाद यह विधेयक लाने में सक्षम हुए। उन्होंने कहा, “आप सरकार ने इस विधेयक का मसौदा बहुत सावधानीपूर्वक तैयार किया है ताकि भविष्य में कोई भी संशोधन या कमियां इसे कमजोर न कर सकें।”
मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि यह कानून समाज विरोधी तत्वों के खिलाफ बड़ी रोक के रूप में काम करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में कोई भी इस तरह का जघन्य अपराध करने की हिम्मत न करे। उन्होंने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी करना शांति, सद्भावना, भाईचारे और श्रद्धा को ढहाने की गहरी साजिश थी। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी हर सिख के पिता हैं और इनकी पवित्रता को बनाए रखना सभी का सामूहिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा उठाए गए इस ऐतिहासिक कदम के लिए दुनिया भर के लोग खुश हैं और आभार व्यक्त कर रहे हैं।
इस अवसर पर पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां और अन्य लोग भी मौजूद थे।
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पंजाब में महिलाओं को भगवंत सिंह मान सरकार की मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत सुरक्षित एवं समय पर प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुँच का लाभ
स्टेट हेल्थ एजेंसी (SHA), पंजाब के आंकड़ों के अनुसार मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत किए गए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) मामलों में से 57 प्रतिशत गर्भावस्था के पहले आठ सप्ताह के भीतर किए गए। अब तक दर्ज 323 कैशलेस प्रक्रियाओं, जिनकी कुल लागत 14.86 लाख रुपये रही, में से 185 मामले शुरुआती गर्भावस्था के दौरान किए गए। यह राज्य भर के 800 से अधिक सूचीबद्ध अस्पतालों में समय पर और सुरक्षित प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती पहुँच को दर्शाता है।
गर्भपात का निर्णय कई व्यक्तिगत, चिकित्सकीय और सामाजिक-आर्थिक कारणों से प्रभावित होता है। मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत पहले आठ सप्ताह के भीतर किए गए एमटीपी मामलों की संख्या कुल मामलों के आधे से अधिक रही, जिससे यह योजना के अंतर्गत सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली श्रेणी बन गई है।
ये आंकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं जब मुख्यमंत्री भगवंत मान सरकार ने मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत गर्भसमापन (एमटीपी) सेवाओं की कैशलेस सुविधा का दायरा बढ़ाया है। अब महिलाएँ सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में भी बिना ख़र्च किए ये सेवाएँ प्राप्त कर सकती हैं, जिससे पूरे पंजाब में स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच और आसान हो गई है।
आंकड़े संकेत देते हैं कि अधिकांश लाभार्थी गर्भावस्था के शुरुआती चरणों में ही गर्भपात सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं, जब चिकित्सकीय प्रक्रियाएँ कम जटिल होती हैं और स्वास्थ्य ज़ोखिम भी कम होते हैं।
मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत पंजाब के 800 से अधिक सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में एमटीपी सेवाएँ कैशलेस उपलब्ध हैं। इस योजना का उद्देश्य लोगों के जेब से होने वाले ख़र्च को कम करना और समय पर प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बेहतर बनाना है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा कि सूचीबद्ध स्वास्थ्य संस्थानों के हालिया विस्तार का उद्देश्य सेवाओं तक पहुँच को आसान बनाना और उपचार में होने वाली देरी को कम करना है। उन्होंने कहा, “सरकारी और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में कैशलेस सेवाएँ उपलब्ध करवाने का उद्देश्य समय पर उपचार सुनिश्चित करना और देरी से हस्तक्षेप के कारण उत्पन्न होने वाली जटिलताओं को कम करना है।”
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सकीय निगरानी में समय पर गर्भपात सेवाओं तक पहुँच स्वास्थ्य ज़ोखिमों को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। माता कौशल्या अस्पताल की सीनियर प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रमिता अग्रवाल ने कहा कि निर्धारित गर्भकाल सीमा के भीतर चिकित्सकीय निगरानी में किया गया गर्भसमापन सुरक्षित और प्रभावी होता है।
उन्होंने कहा कि उपचार लेने में देरी अक्सर आर्थिक कठिनाइयों, जागरूकता की कमी और सामाजिक बाधाओं से जुड़ी होती है, जिसके कारण कई बार महिलाएँ असुरक्षित तरीकों या स्वयं दवा लेने का सहारा लेती हैं। उन्होंने कहा, “सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी भी दवा या प्रक्रिया से पहले प्रत्येक मामले का उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।”
डॉ. रमिता अग्रवाल ने गर्भपात करवाने के कुछ सामान्य कारण भी साझा किए:
गर्भनिरोधक साधनों का प्रभावी न होना : कंडोम, आईयूडी या अन्य गर्भनिरोधक साधनों का अपेक्षित रूप से प्रभावी न होना।
अनियोजित या अनचाहा गर्भधारण: जब महिला या दंपत्ति बच्चे के लिए तैयार न हों।
आर्थिक कारण: प्रसव और बच्चे के पालन-पोषण से जुड़े ख़र्चों को लेकर चिंताएँ ।
माँ के स्वास्थ्य संबंधी ज़ोखिम: गर्भावस्था जारी रहने से महिला के शारीरिक स्वास्थ्य पर ख़तरा होना।
भ्रूण में गंभीर असामान्यताएँ : भ्रूण में गंभीर जन्मजात या चिकित्सकीय समस्याओं का पता चलना।
व्यक्तिगत, शैक्षणिक या करियर संबंधी कारण: गर्भावस्था का पढ़ाई, नौकरी या जीवन की अन्य योजनाओं पर प्रभाव पड़ना।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सेहत योजना का विस्तार प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने में कैशलेस स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। यह आर्थिक बाधाओं को कम करके और संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाकर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में मदद कर रहा है।
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