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Turmeric Benefits: हल्दी से cancer ka इलाज क्या मुमकिन है?
भारत समेत सभी दक्षिण एशियाई देशों की रसोई में हल्दी का इस्तेमाल होता है। लेकिन क्या हल्दी सिर्फ स्वाद के लिए इस्तेमाल होती है या फिर यह हमारा स्वास्थ्य बेहतर करने से लेकर हमें कैंसर तक से बचा सकती है?
भारत समेत सभी दक्षिण एशियाई देशों की रसोई में हल्दी (turmeric) का इस्तेमाल होता है। लेकिन क्या हल्दी सिर्फ स्वाद के लिए इस्तेमाल होती है या फिर यह हमारा स्वास्थ्य बेहतर करने से लेकर हमें Cancer तक से बचा सकती है? हल्दी पर हजारों अध्ययन हो चूके हैं। माना जाता है कि इसमें मौजूद एक यौगिक इसके औषधीय गुणों के लिए जिम्मेदार है।
चूहों पर हुए प्रयोग में पाया गया है की करक्युमिन की काफी अधिक मात्रा उनमें कई तरह के कैंसर को बढ़ने से रोकती है लेकिन हल्दी में दो तीन फ़ीसदी कर cumen होता है और जब हम इसे खाते है तो उतनी ही मात्रा में ये हमारे शरीर में अवशोषित नहीं होती।
क्या थोड़ी मात्रा में हल्दी का लगातार इस्तेमाल हमारे सवस्थ को बेहतर कर सकता है या फिर हमें हल्दी मिले सप्लीमेंट या करक्यूमेन का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि बीमारियां दूर रहें। ये जानने के लिए हमने ब्रिटेन में हल्दी के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के बारे में हो रही रिसर्च का जायजा लिया। इसमें 100 वालंटियर्स को शामिल किया गया। इनमें लोगों को तीन समूहों में बांटा गया।
पहले समूह को हर दिन एक चम्मच हल्दी खिलाई गई। दूसरे समूह को इतनी ही हल्दी सप्लीमेंट के तौर पर दी गई। तीसरे समूह को हल्दी बताकर कोई और चीज़ दे दी गई। हमने उनके ब्लड सैंपल पर तीन टेस्ट किए।
पहले टेस्ट में यह देखा गया कि हल्दी खाने वाले शख्स की रक्त कोशिकाओं ने जलन का किस तरह प्रतिरोध किया और यह बताया कि उसका इम्युन सिस्टम कितना सवस्थ है। इससे यह जानने में मदद मिल सकती थी कि क्या हल्दी जलन को इतना अधिक घटा सकती है?
कि डायबिटीज़ जैसी लंबी बीमारियों पर असर पड़ सके। दूसरे दौर के टेस्ट में श्वेत रक्त कोशिकाओं की गिनती की गई। डी एन ए टेस्ट के लिए इसके नतीजों की जरूरत थी, लेकिन इसके विश्लेषण ने हमें रिसर्च में शामिल लोगों के इम्युन सिस्टम की स्थिति का भी संकेत दिया। तीसरा टेस्ट यूनिवर्सिटी कॉलेज लंडन की ओर से विकसित किया गया।
इसमें DNA के methylation का पता लगाया गया। हल्दी के कैंसर रोधी गुण का पता लगाने के लिए यह रिसर्च की गई थी। न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस टेस्ट विकसित किया गया था, उसके मुताबिक रिसर्च में शामिल किए गए तीनों समूहों के लोगों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का लेवल बराबर है। हमारे इम्युन सिस्टम पर मौसम के बदलाव का असर होता है। सनबर्न ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा देता है। हफ्ते में इस तरह का बदलाव सभी तीन ग्रुप के लोगों में दिखने लगा था।
White blood cells की गिनती से ये पता चला कि तीनों समूहों में इम्युन कोशिकाओं की कमी आई है। सभी समूहों में यह बराबर घटा है। हल्दी के नाम पर कुछ और लेने वाले और हल्दी सप्लीमेंट लेने वालों के डी एन ए मैथ्यूलेशन में कोई अंतर नहीं था, लेकिन जो लोग भोजन में हल्दी का इस्तेमाल कर रहे थे उनके मैथिलीशियन पैटर्न में अंतर था। यु सी एल के रिसर्चन ने एक जीन में नाटकीय बदलाव देखा।
और यह जीन चिंता, अस्थमा, एक्सीमा और कैंसर के जोखिम से जुड़ा था। इस जीन की गतिविधियों में बदलाव दिख रहा था। ये कहना जल्दबाजी होगी की इसका सकारात्मक असर होता है या नकारात्मक। लेकिन हल्दी की वजह से जीन की गतिविधियों में यह बदलाव फायदेमंद साबित हो सकता है। लेकिन यहाँ एक बात बता देना जरूरी है। रिसर्चरो ने रिसर्च में शामिल लोगों के ब्लड सैंपल में करक्युमिन के स्तर का विश्लेषण नहीं किया था।
एक वजह यह भी हो सकती है कि जो लोग खाना बनाने में हल्दी का इस्तेमाल कर रहे थे, उन्होंने अपना आहार बदला हो। इससे मैथ्यूलेशन बदल गया। हालांकि यह हल्दी का असर नहीं था। एक सवाल उठता है कि भोजन में हल्दी और हल्दी सप्लीमेंट के इस्तेमाल में क्या फर्क है? यह समझा जाता है कि भोजन बनाने में हल्दी का इस्तेमाल हमारे शरीर में कर्फ्यूमिन अवशोषित करने का स्तर तय करता है।
curcumin lipophilic होता है इसका मतलब ये है की वो वसा से बंधा होता है। लिहाजा जब हम भोजन बनाने में तेल का इस्तेमाल करते है तब करक्यूमेन तेल से बंध जाता है और ये आसानी से हमारे पेट में गुल मिल जाता है। काली मिर्च भी है, काम कर सकती है। इसमें मौजूद पिपरिन नाम का एक यौगिक ये काम कर सकता है। इसलिए हल्दी, काली मिर्च और तेल को मिला कर बना खाना अच्छा कॉम्बिनेशन साबित हो सकता है।
इन अध्ययन से पता चला कि कैंसर विकसित होने से रोकने वाली चीज़ के तौर पर हल्दी पर आगे रिसर्च की जा सकती है। यानी इसमें कैंसर का विकास रोकने की क्षमता हो सकती है। हालांकि कैंसर जैसी लंबे समय में विकसित होने वाली बीमारियों का जोखिम घटाने का रास्ता तलाशना काफी मुश्किल होता है। इसलिए कोई भी ऐसी जांच जो इन बीमारियों के बारे में शुरुआती चेतावनी सही सही देती हो या फिर।
जो इतनी संवेदनशील हो इससे जुड़े जोखिम में हल्के परिवर्तन के बारे में बताती हो, काफी अहम होती है। रिसर्च के नतीजे ये भी बताते हैं कि कम मात्रा में हल्दी लगातार खाने पर हमारे शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अभी यह रिसर्च शुरुआती दौर में है, लेकिन यह कहा जा सकता है कि हल्दी आपको कई पुराने बीमारियों से बचाने में मदद कर सकती है। इसलिए खाने में हल्दी का इस्तेमाल आपके स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है।
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Single Parenting: भारत में एक चुनौती या समानता का प्रतीक?
क्या भारत में Single Parent होना एक बड़ी चुनौती है? यह एक सवाल है जिस पर अधिकांश लोगों के मत अलग-अलग हो सकते है। Single Parenting एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
क्या भारत में Single Parent होना एक बड़ी चुनौती है? यह एक सवाल है जिस पर अधिकांश लोगों के मत अलग-अलग हो सकते है। Single Parenting एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। समाज में सिंगल पेरेंट की स्थिति कई तरह के प्रश्न उठाती हैं, जैसे कि वह अपने बच्चे की देखभाल कैसे करेगा, फाइनेंशियल सपोर्ट कहाँ से प्राप्त करेगा, और सामाजिक और मानसिक समर्थन कैसे प्राप्त करेगा।
Single Parenting में आने वाली चुनौतियां
- सिंगल पेरेंटिंग एक अनूठा सफर है, जिसमें चुनौतियां और जिम्मेदारियां दोनों का ही सामना एक अकेले पेरेंट को करना पड़ता है।
- फाइनेंस: सिंगल पेरेंट के लिए वित्तीय स्थिति को संतुलित रखना बड़ी चुनौती हो सकती है। एक ही आय स्रोत से घरेलू खर्चों को पूरा करना और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखना मुश्किल हो सकता है।
- बच्चों का लालन-पालन: बच्चों को संभालना, उनकी शिक्षा, और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना यह सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है।
- देखभाल: जिंदनी में किसी का साथ न होना और अकेले ही बच्चे की देखभाल करना, ऊपर से दोहरी जिम्मेदारियों का दबाव बना रहता है।
- रोल मॉडलिंग: सिंगल पेरेंट को अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल और उनका आदर्श बनना होता है। उन्हें आदर्शों और मूल्यों को सिखाने के लिए सक्षम होना पड़ता है।
- बच्चों में सुरक्षा: बच्चों की सुरक्षा और उनकी चिंता एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। उन्हें सुरक्षित रखना और उनकी चिंता करना सिंगल पेरेंट के लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
जिम्मेदारियों और संघर्षों का सामना
- माता या पिता की मृत्यु: यह सबसे दुखद कारण है जिस वजह सिंगल ही परिवार को चलाना पड़ता है। घर में माता या पिता की मृत्यु के बाद, बच्चों को अकेले पालने में एक अभिभावक को कई जिम्मेदारी का सामना करना पड़ता है।
- माता-पिता के बीच अलगाव या तलाक: बच्चे के जन्म के बाद, माता-पिता के बीच किसी कारण तलाक या अलगाव की स्थिति सिंगल पेरेंट बनने का कारण बनती है।
- माता-पिता द्वारा परित्याग: कभी-कभी काम काज की वजह से बच्चों के माता-पिता अपने परिवार को छोड़ जाते हैं, इससे किसी एक अभिभावक पर बच्चों की जिम्मेदारी आ जाती है।
- रोज़गार की तलाश और प्रवास: आजकल के भागमभाग जीवन में, लोग अक्सर अपने रोज़गार के लिए अन्य शहरों या देशों में जाना पसंद करते हैं। ऐसे मामलों में, एकल-माता या पिता अपने बच्चों को पीछे छोड़ जाते हैं।
- व्यक्तिगत चुनौतियाँ: कभी-कभी किसी व्यक्ति ने स्वयं सिंगल पेरेंट बनने का चुनाव किया होता है, जैसे गोद लेना, IVF, आदि। ऐसे मामलों में, बच्चों को सिंगर पेरेंट द्वारा पाला जाता है।
सिंगर पेरेंट रिटायरमेंट के लिए बनाएं फाइनेंशियल प्लान
अकेले पैरेंट्स के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग बनाना और उन्हें कार्रवाई में लाना वास्तव में एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। इस संदर्भ में, म्युचुअल फंड में निवेश करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है जो उन्हें उनके आर्थिक परेशानियों से निकलने में मदद करेगा।
विशेष रूप से, सिंगल पैरेंट्स के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा और अन्य आर्थिक जरूरतों के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के साथ-साथ अपने भविष्य की भी देखभाल करनी चाहिए। म्युचुअल फंड्स इसके लिए एक सुगम और सुरक्षित विकल्प हैं। यह अच्छा होगा है कि पैरेंट्स स्वयं या एक वित्तीय सलाहकार से बात करें ताकि वे अपनी वित्तीय योजनाओं को सही दिशा में ले सकें।
भारत में 13 मिलियन सिंगल मदर्स
एकल माताओं का संघर्ष और सम्मान हमें सोचने पर मजबूर करता है कि किस प्रकार से उनका योगदान हमारी समाज में अद्वितीय है। सिंगल मदर जो अकेले होती हैं और अपने बच्चों के पलन-पोषण, शिक्षा, और परिवारिक जीवन की जिम्मेदारियों का सम्मान करती हैं, वास्तव में समाज के रचनाकारों में से एक हैं। भारत में लगभग 13 मिलियन ऐसी माताएं हैं जो अपने बच्चों का पालन-पोषण संभालती हैं, जो भारतीय परिवारों का लगभग 4.5% है।
विश्व भर में, ज्यादातर सिंगल मदर अपने घरों का नेतृत्व करती हैं, जो अक्सर समाज के अनदेखे क्षेत्रों में काम करती हैं। वे न केवल अपने बच्चों को पालन-पोषण कर रही हैं, बल्कि , बुजुर्गों की देखभाल, और घरेलू काम भी करती है। इसके अलावा, वे बाहरी काम करके अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
समाज में सिंगल पेरेंटिंग की स्थिति को समझने में, हमें इसके साथ साथ उन अकेले देखभाल कर रहे माताओं और पिताओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी महसूस करना चाहिए, जो अपने बच्चों के साथ निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने न केवल अपने परिवार को संभाला है, बल्कि समाज को भी एक सकारात्मक योगदान दिया है।
सिंगल पेरेंटिंग एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, लेकिन इसके साथ ही यह समानता का प्रतीक भी है, जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए, हमें समाज में सिंगल पेरेंटिंग को समझने और समर्थन करने की आवश्यकता है, ताकि हम एक साथ मिलकर एक समृद्ध और सहयोगी समाज की दिशा में अग्रसर हो सकें।
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Mental Health: एक महत्वपूर्ण चुनौती जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए
शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखना जरूरी है, यह बिल्कुल सही है। हमारे शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखने से हम बीमारियों से बच सकते हैं, ऊर्जा बढ़ा सकते हैं और एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। लेकिन, क्या हम यह भूल रहे हैं कि हमारी मानसिक स्वास्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखना जरूरी है, यह बिल्कुल सही है। हमारे शारीरिक स्वास्थ का ध्यान रखने से हम बीमारियों से बच सकते हैं, ऊर्जा बढ़ा सकते हैं और एक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। लेकिन, क्या हम यह भूल रहे हैं कि हमारी मानसिक स्वास्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
मानसिक स्वास्थ न केवल हमारे दिमाग की सेहत को संतुलित रखता है, बल्कि यह हमारे जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। एक स्वस्थ मानसिक स्थिति में हम स्ट्रेस को संभाल सकते हैं, संवेदनशीलता को विकसित कर सकते हैं और सकारात्मक भावनाओं के साथ अपने जीवन को भर सकते हैं।
हालांकि, दुःख की बात यह है कि हमारे समाज में मानसिक स्वास्थ और मानसिक पीड़ा को बहुत कम महत्व दिया जाता है। बहुत से लोग मानसिक स्वास्थ के मुद्दों को अनदेखा करते हैं, जिससे वे संभावित रोगों या संकटों से घिरे रहते है।
मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरुकता
मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा करना जरूरी है, क्योंकि यह हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। हम सभी कभी-कभी तनाव, चिंता, उदासी, या दिक्कतों का सामना करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हम कमजोर हैं, बल्कि यह हमारी मानसिक मजबूती का परिचय कराता है।
मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए, हमें अपने अंदर की बातों को सुनना और समझना जरूरी है। हमें अपने मन की सेहत को सकारात्मक रखना चाहिए। समाज में ऐसे माहौल को बनाना होगा जहां हर कोई अपने दिल की बात कह सके। यह समाज के लिए हम सभी की जिम्मेदारी है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है भेदभाव
भेदभाव न केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। इसे खत्म करने के लिए, हमें समाज में धार्मिक, जातिगत, लिंगीय और अन्य भेदों के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।
पहले, बात करें लैंगिंग और जेंडर भेदभाव के बारे में। जब हम लोगों को उनके लिंग, जाति, या सेक्सुअल पहचान के आधार पर निर्धारित करते हैं, तो हम उन्हें एक स्थिति में प्रतिबद्ध कर देते हैं। इसका परिणाम होता है मानसिक तनाव, अवसाद, और अकेलापन।
देखा जाए तो अक्सर लड़कियों, थर्ड जेंडर या गे, होमो सेक्सुअल आदि को लिंगभेद की वजह से मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। स्कूल, दफ्तर या सोसाइटी में भी किसी खास वर्ग को अपमान या नीचा दिखाने से भी वो वर्ग मानसिक समस्याओं से गुजरता है। जिसका आप और हम अनुमान भी नहीं लगा सकते।
इसके अतिरिक्त, सामाजिक बहिष्कार और विभाजन भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। जब हम एक विशेष ग्रुप के सदस्य को उनकी पहचान के कारण बाहर कर देते हैं, तो उन्हें असुरक्षित और असमान महसूस हो सकता है। इससे उनका आत्मसम्मान कम होता है और वे अपनी मानसिक स्वास्थ्य के साथ समस्याएं झेल सकते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या
मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ 14 साल की उम्र में शुरू होती हैं और 75% मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ 24 साल की उम्र में विकसित होती हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या अभी नया विषय है, जिसका सामना हमें संयमित और प्रभावी रूप से करना होगा। मानसिक स्वास्थ्य की गंभीरता को समझने के लिए, हमें उसकी जड़ को समझना होगा, ताकि हम समाज में को सुधार सकें और उसे सही दिशा में ले सकें। देश में लाखों लोग मानसिक विकारों से पीड़ित हैं, जो उनके और उनके परिवार के लिए अत्यंत अधिक परेशानी और पीड़ा का कारण बनते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मूल कारण बहुत सारे हो सकते हैं, जैसे दिनचर्या में बदलाव, दैनिक तनाव, जीवन में असमंजस, और भारी दवाओं का अनुप्रयोग। साथ ही, सामाजिक परिस्थितियों का भी असर होता है, जैसे वित्तीय समस्याएं, अलगाव, ब्रेकअप आदि। WHO के आँकड़े बताते है कि भारत में प्रति लाख लोगों पर आत्महत्या की औसत दर 10.9 है ।
मानसिक स्वास्थ के लिए इंश्योरेंस कंपनी
- HDFC ERGO
- Reliance’s Health Infinity Insurance Policy
- ICICI Lombard
- Loop Health
- Aditya Birla Health Insurance
- Niva Bupa Health Insurance
मानसिक बीमारियों की समस्या का हल हम सभी की जिम्मेदारी है। हमें समाज में सामान्यत: स्वीकृत और समानिता की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। मानसिक स्वास्थ को बनाए रखना सिर्फ एक सेहतमंद जीवन का पहला कदम नहीं है, बल्कि यह एक खुशहाल और समृद्ध समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए, सकारात्मक सोच, संतुलित जीवनशैली, और स्वस्थ रिश्तों का होना हमारे मानसिक स्वास्थ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये हमें जीवन के हर क्षण को आनंदमय और संतुष्ट बनाए रखने में मदद करते।
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Food Waste: 20% भोजन कचरे में, दुनिया में 80 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे
Food Waste: दुनिया में, जहां लाखों लोग रात को भूखे पेट सोते हैं, उसमें यह स्वीकार करना दुःखद है कि हम लगभग 100 मिलियन टन Food को हर दिन waste कर रहे हैं। यह चौंकाने वाला आंकड़ा हमारी वैश्विक खाद्य प्रणाली में एक गंभीर असंतुलन को प्रकट करता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा जारी ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024’ ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में भोजन का लगभग 20 फीसदी का भाग कचरे में फेंक दिया जाता है। यह बात चिंताजनक है कि एक तरफ भूखे लोगों की संख्या बढ़ रही है, तो दूसरी ओर हम अनावश्यक रूप से खाने लायक भोजन को फेंक रहे हैं।
60 फीसदी खाना घरों में होता है बर्बाद
‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024’ की रिपोर्ट की बात करें तो विश्व स्तर पर खाद्य पदार्थों की अधिकांश बर्बादी हमारे घरों में हो रही है, इस बर्बादी की कुल मात्रा लगभग 63.1 करोड़ टन है, जिसमें से अधिकांश, यानी 60 फीसदी, घरों में बर्बाद हो रहा है। इसी तरह, खाद्य सेवा क्षेत्र में 29 करोड़ टन और फूटकर सेक्टर में 13.1 करोड़ टन खाद्य उत्पादों की बर्बादी हो रही है। आंकड़ों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए सालाना औसतन 79 किलो खाने की बर्बादी हो रही है।
Food Waste–भारत में हर साल 7.8 करोड़ टन से ज्यादा
भारतीय समाज में भोजन की महत्वता अत्यधिक है, लेकिन क्या हम इस तरफ ध्यान दे रहे हैं? रिपोर्टों ने दिखाया कि भारत में फूड वेस्ट की मात्रा बड़ी है, जबकि कई लोगों को कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है। भारत में फूड वेस्ट की मात्रा बड़ी है, जबकि कई लोगों को कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है।
2021 में जारी ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट’ के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति बर्बाद किए जा रहे भोजन का आंकड़ा सालाना 50 किलोग्राम था। इस आंकड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा घरों में हो रहे फूड वेस्ट है। ये सोचने वाली बात है कि एक ओर जब दुनिया में भूखमरी और अनाज की कमी के मुद्दों पर बात हो रही है और दूसरी ओर इतने बड़े पैमाने पर भोजन की बर्बादी हो रही है।
‘द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, 74.1 फीसदी भारतीयों के लिए पोषण से भरी थाली किसी लक्जरी से कम नहीं है। यह संकेत है कि इतने प्रयासों के बावजूद भी खाने की कमी का सामना करना पड़ रहा है। 2023 ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, देश की 16.6 फीसदी आबादी किसी न किसी रूप में कुपोषण का शिकार है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। एक ओर भारत में खाद्य पदार्थों की बर्बादी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, दूसरी ओर करोड़ों लोग भोजन के अभाव से जूझ रहे हैं।
पर्यावरण और जलवायु पर पड़ रहा बुरा असर
दरअसल, गर्म देशों की जलवायु गर्म होने के कारण ज्यादा भोजन बर्बाद होता है क्योंकि वहाँ रेफ्रिजरेशन कम होता है, जिससे खाद्य को सुरक्षित रखने में परेशानी होती है जिससे खाना जल्दी खराब होता है। गर्म तापमान और लू के कारण भोजन को सुरक्षित ढंग से रखना मुश्किल हो जाता है, जिससे बड़ी मात्रा में भोजन बर्बाद होता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ जाता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है।
खाद्य बर्बादी और नुकसान 10% वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है, जो विमानन क्षेत्र में कुल उत्सर्जन का पाँच गुणा है। इस पर ध्यान देते हुए, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने खाद्य बर्बादी से उत्सर्जन कम करने की मांग की है।
खाने की बर्बादी के लिए जिम्मेदार कौन?
2022 में एक अध्ययन के अनुसार 28% खाना बर्बाद करने के लिए रेस्तरां, होटल, और कैंटीन जिम्मेदार थे, लेकिन सबसे ज्यादा खाने की बर्बादी लोगों के घरों में होती है। खाने की बर्बादी के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मुख्य कारण उसकी एक्सपाइरी डेट होती है। ऐसे में हमें खाने को फेंकने के बजाय उसे इस्तेमाल करने का तरीका सिखाना चाहिए।
खाने की बर्बादी में गरीब और अमीर देश एक समान
यह सत्य है कि भोजन की बर्बादी की समस्या दुनिया भर में है, और यह न केवल गरीब देशों की समस्या है, बल्कि अमीर देशों में भी इसकी वही स्थिति है। यूएनईपी के अनुसार, खाने की बर्बादी का स्तर उच्च, उच्च मध्यम, और निम्न मध्यम आय वाले देशों में समान है। समस्या का समाधान केवल साझेदारी, संयुक्त प्रयास, और सहायता से हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि खाद्य अपशिष्टता के समाधान में सभी का सहयोग आवश्यक है, चाहे वह अमीर हों या गरीब।
ध्यान देने वाली बात यह है कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी वैश्विक समस्या है, इससे भोजन तो बर्बाद हो ही रहा है बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता और प्रदूषण जैसी समस्याओं को भी बढ़ावा मिलता है। हमें इसे ध्यान में रखकर समाधान की ओर कदम बढ़ाना होगा। अगर हम खाद्य पदार्थों की बर्बादी क्यों हो रही है इस पर ध्यान दें तो हम खाद्य की व्यर्थ और बर्बादी को कम कर सकते हैं। इससे हम जलवायु परिवर्तन और आर्थिक हानि को भी कम कर सकते हैं।
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