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भगवंत मान सरकार ने प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमर्ज़ी की फ़ीसें बढ़ाने पर लगाई रोक

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प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने के सिलसिले को खत्म करने और पंजाब भर के लाखों परिवारों को लंबे समय से प्रतीक्षित राहत देने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, भगवंत मान सरकार ने एक व्यापक नियामक ढांचे की घोषणा की है। इसके तहत वार्षिक फीस वृद्धि पर 5 फीसदी की सीमा लगाई गई है। जिन स्कूलों ने पिछले तीन सालों के दौरान वार्षिक सीमा का उल्लंघन किया है, उनके द्वारा वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस करना अनिवार्य किया गया है और सख्त जुर्मानों के प्रावधान के अलावा अंततः स्कूल की मान्यता तक रद्द की जा सकती है।

प्रस्तावित कानून, जिसे मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वृद्धि के खिलाफ देश का सबसे सख्त कानून करार दिया है, आगामी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा और यह पंजाब के सभी प्राइवेट स्कूलों पर लागू होगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि पांच फीसदी की यह सीमा सिर्फ ट्यूशन फीस पर ही नहीं, बल्कि स्कूलों द्वारा वसूले जाने वाले सभी अनिवार्य खर्चों और फंडों पर भी लागू होगी, जिससे उन सभी रास्तों को बंद कर दिया जाएगा, जिनका उपयोग संस्थान अक्सर माता-पिता पर अतिरिक्त खर्चों का बोझ डालने के लिए करते हैं। फीस में बेलगाम वृद्धि पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा 2019 में किए गए संशोधनों के कारण संभव होने की बात कहते हुए, मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने दावा किया कि नया कानून शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही बहाल करेगा, माता-पिता को लूट-खसूट से बचाएगा और स्कूल फीस को लेकर बच्चों व परिवारों की होने वाली मानसिक परेशानी को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।

‘एक्स’ पर मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने लिखा, “अमृतसर में हुई दुखद घटना के बाद मुझे पिछले 24 घंटों के दौरान प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमानी फीस बढ़ाने के संबंध में माता-पिता के सैकड़ों फोन आए हैं। हमारे बच्चों के भविष्य और माता-पिता को हो रही भारी परेशानी को ध्यान में रखते हुए आपकी सरकार ने बहुत ही महत्वपूर्ण और सख्त फैसला लिया है।”

मुख्यमंत्री ने आगे लिखा, “पंजाब के किसी भी प्राइवेट स्कूल को अब अपनी वार्षिक फीस में पांच फीसदी से अधिक वृद्धि करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके अलावा, जिन स्कूलों ने पिछले तीन सालों में फीस में 15 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी की है, उन्हें माता-पिता से वसूली गई अतिरिक्त राशि तुरंत वापस करनी होगी। इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए हम जल्द ही अध्यादेश लाएंगे। पांच फीसदी की सीमा सिर्फ ट्यूशन फीस पर ही लागू नहीं होगी, बल्कि स्कूलों द्वारा वसूले जाने वाले अन्य सभी अनिवार्य फंडों और खर्चों को भी कवर करेगी।”

उन्होंने पोस्ट के अंत में कहा, “यह देश में अपने तरह का सबसे सख्त नियम होगा और किसी भी स्कूल को कोई छूट नहीं दी जाएगी। पंजाब में शिक्षा के नाम पर माता-पिता और विद्यार्थियों की लूट-खसूट अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि प्राइवेट अनएडेड (गैर-सहायता प्राप्त) स्कूलों का फीस ढांचा इस वक्त ‘पंजाब रेगुलेशन ऑफ फीस ऑफ अनएडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एक्ट, 2016’ के अधीन आता है, जिसमें 2019 में संशोधन किया गया था, लेकिन पिछली सरकारें इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने में नाकाम रहीं, जिसके कारण स्कूलों को माता-पिता पर फीस बढ़ोतरी का बोझ डालने की खुल्लम-खुल्ला इजाजत मिली।

मुख्यमंत्री ने कहा, “पंजाब सरकार ने वार्षिक फीस वृद्धि पर पांच फीसदी की सीमा लगाने का फैसला किया है ताकि कोई भी स्कूल इस सीमा से अधिक फीस ना बढ़ा सके। हम इस संबंध में अध्यादेश लाएंगे। जिन स्कूलों ने पिछले तीन सालों के दौरान फीस में 15 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी की है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। 2016 के मूल एक्ट में स्पष्ट तौर पर यह शर्त रखी गई थी कि फीसों में बढ़ोतरी पिछले साल की फीस के 8 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए, लेकिन पिछली सरकार द्वारा किए गए संशोधनों के जरिए इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया गया था।”

मुख्यमंत्री ने बताया कि 2019 के संशोधन ने स्कूलों को एक ‘डिस्क्लोजर मैकेनिज्म’ के जरिए निर्धारित सीमा से अधिक फीस बढ़ाने की इजाजत दी थी, जिसके तहत स्कूलों के लिए दाखिला प्रक्रिया शुरू होने से पहले प्रस्तावित फीस बढ़ोतरी को स्कूल के नोटिस बोर्डों, स्कूल की वेबसाइटों और स्कूल शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से दर्शाना अनिवार्य था। उन्होंने आगे कहा, “हालांकि कानून ने फीस बढ़ोतरी के संबंध में पारदर्शिता को अनिवार्य बनाया था, लेकिन व्यावहारिक रूप से इन नियमों को शायद ही कभी लागू किया गया। नतीजतन, माता-पिता को अनुचित और बहुत अधिक फीस के बोझ का सामना करना पड़ता रहा।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि फीस बढ़ोतरी से संबंधित सभी लंबित शिकायतों की अब जांच की जाएगी और उन पर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा, “रेगुलेटरी बॉडी बहुत अधिक फीस बढ़ोतरी पर तीखी नजर रखेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि फीस में कोई भी वृद्धि वास्तविक खर्चे या विकास गतिविधियों के आधार पर जायज हो और इसका नतीजा मुनाफाखोरी के रूप में ना निकले। यह बॉडी यह भी सुनिश्चित करेगी कि विद्यार्थियों से वसूले गए फंड का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए ना किया जाए। गंभीर उल्लंघनों के मामलों में स्कूलों को जुर्माने, मान्यता या एफिलिएशन रद्द किए जाने और विद्यार्थियों से वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस करने के आदेशों का सामना करना पड़ सकता है।”

इस कदम को शिक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस अध्यादेश का उद्देश्य विद्यार्थियों, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित विद्यार्थियों की लूट-खसूट को खत्म करना है। उन्होंने दावा किया कि “इस कानून का मकसद विद्यार्थियों और उनके परिवारों की लूट-खसूट को रोकना है। भारी फीस की मांग करने वाली संस्थाओं की मनमानी के कारण कोई भी बच्चा कभी भी निराशा में नहीं डूबना चाहिए। प्राइवेट स्कूलों द्वारा बेहिसाब फीस बढ़ाने के खिलाफ पंजाब में देश का सबसे सख्त कानून होगा।”

नया फीस रेगुलेशन ढांचा माता-पिता, विद्यार्थियों और निजी स्कूलों को कैसे प्रभावित करेगा

प्रस्तावित अध्यादेश ‘पंजाब रेगुलेशन ऑफ फीस ऑफ अनएडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एक्ट, 2016’ के आधार पर तैयार किया गया है, जो पंजाब भर के प्राइवेट अनएडेड स्कूलों में फीस ढांचे को रेगुलेट करता है। हालांकि यह एक्ट स्कूलों को अपनी फीस खुद निर्धारित करने की इजाजत देता है, लेकिन यह स्पष्ट तौर पर मुनाफाखोरी और कैपिटेशन फीस वसूलने की मनाही करता है। मूल कानून के तहत वार्षिक फीस बढ़ोतरी पिछले साल की फीस के 8 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती थी। हालांकि, 2019 में किए गए संशोधनों ने स्कूलों को एक डिस्क्लोजर मैकेनिज्म के जरिए इस सीमा से अधिक फीस बढ़ाने की इजाजत दी थी, जिसके लिए दाखिला प्रक्रिया शुरू होने से पहले प्रस्तावित फीस बढ़ोतरी को स्कूल के नोटिस बोर्डों, स्कूल की वेबसाइटों और स्कूल शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर दर्शाना जरूरी था। पंजाब सरकार के अनुसार, वास्तव में इन नियमों को शायद ही कभी लागू किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप कई संस्थानों में फीस में बेरोक-टोक बढ़ोतरी हुई।

पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तावित नए ढांचे के तहत वार्षिक फीस बढ़ोतरी की सीमा पांच फीसदी निर्धारित की जाएगी। सरकार ने यह संकेत भी दिया है कि जिन स्कूलों ने पिछले तीन सालों के दौरान फीस में 15 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी की है, उन्हें जांच और कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। बहुत अधिक फीस बढ़ोतरी से संबंधित सभी लंबित शिकायतों की अधिकारियों द्वारा जांच किए जाने की उम्मीद है।

माता-पिता के पास पहले से ही जिला स्तरीय रेगुलेटरी बॉडी के समक्ष फीस बढ़ोतरी को चुनौती देने का कानूनी अधिकार है। मौजूदा कानून के तहत शिकायतों की प्राप्ति के 15 दिनों के अंदर जांच होनी चाहिए और 60 दिनों के अंदर फैसला किया जाना चाहिए। रेगुलेटरी बॉडी के पास मामलों की जांच करते समय सिविल कोर्ट (दीवानी अदालत) के बराबर शक्तियां होती हैं। इस संस्था की अगुवाई जिले के डिप्टी कमिश्नर (डी.सी.) या एडिशनल डिप्टी कमिश्नर (ए.डी.सी.) करते हैं और इसमें जिला शिक्षा अधिकारी (सेकेंडरी) सदस्य सचिव के रूप में शामिल होते हैं, साथ ही दो नामांकित सदस्य होते हैं।

कानून रेगुलेटरी बॉडी को निगरानी की महत्वपूर्ण शक्तियां भी प्रदान करता है। यह बॉडी यह सुनिश्चित करने के लिए अधिकृत है कि स्कूलों का फीस ढांचा उचित सीमाओं के अंदर रहे, मुनाफाखोरी को रोका जा सके, बहुत अधिक फीस बढ़ोतरी की जांच की जा सके, यह पता लगाया जा सके कि क्या बढ़ोतरी अधिक खर्चों या विकास गतिविधियों के कारण जायज है और यह सुनिश्चित किया जा सके कि विद्यार्थियों से वसूला गया पैसा शिक्षा से गैर-संबंधित उद्देश्यों के लिए ना इस्तेमाल किया जाए।

कानून का उल्लंघन करने वाले स्कूलों को चरणबद्ध जुर्माना प्रणाली का सामना करना पड़ेगा। पहले उल्लंघन के लिए जुर्माना प्राइमरी स्कूलों के लिए 30,000 रुपये से लेकर सीनियर सेकेंडरी स्कूलों के लिए एक लाख रुपये तक हो सकता है। बार-बार उल्लंघन करने पर अधिक जुर्माना लगेगा, जो 60,000 से लेकर दो लाख रुपये तक होगा। तीसरे उल्लंघन के मामले में अधिकारी आर्थिक जुर्माना लगाने के अलावा स्कूल की मान्यता या एफिलिएशन रद्द कर सकते हैं। रेगुलेटरी बॉडी के पास माता-पिता से वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस करने के आदेश देने की शक्ति भी है।

पंजाब सरकार प्राइवेट स्कूलों के वित्तीय ऑडिट (खातों की जांच) के लिए प्रणालियों पर भी विचार कर रही है। विचाराधीन एक प्रस्ताव में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की एक कमेटी बनाना शामिल है, जो पिछले तीन से पांच सालों के स्कूलों के वित्तीय रिकॉर्डों की समीक्षा करेगी, जिसमें फीस की वसूली, खर्चे, तनख्वाहें, बुनियादी ढांचे का निवेश, रिजर्व फंड और संबंधित पक्षों के लेन-देन शामिल हैं। ऐसे ऑडिट यह निर्धारित करने में मदद करेंगे कि क्या फीस बढ़ोतरी सचमुच जायज थी और क्या वसूले गए फंडों का उपयोग शिक्षा के उद्देश्यों के लिए किया गया था।

प्रस्तावित अध्यादेश का उद्देश्य इन नियमों को सख्ती से लागू करना, प्राइवेट स्कूलों की निगरानी को मजबूत करना, फीस निर्धारण में अधिक पारदर्शिता लाना और मनमानी फीस बढ़ोतरी को चुनौती देने के लिए मजबूत प्रणाली प्रदान करना है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि शैक्षणिक संस्थान बिना किसी मुनाफाखोरी के काम करें।

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पंजाब विधानसभा में रोजगार और औद्योगिक निवेश पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित

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पंजाब विधानसभा के मानसून सत्र के तीसरे दिन सदन ने रोजगार सृजन और औद्योगिक निवेश को लेकर धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया। इस दौरान सरकार की रोजगार नीतियों, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और राज्य में आए बड़े औद्योगिक निवेश की सराहना की गई।

प्रस्ताव पेश करते हुए विधायक कुलदीप सिंह धालीवाल ने कहा कि 1 अप्रैल 2022 से अब तक योग्यता और पारदर्शिता के आधार पर 68,228 सरकारी नौकरियां दी गई हैं। उन्होंने बताया कि 16 मार्च 2022 से 31 जुलाई 2026 तक पंजाब को 1,83,837 करोड़ रुपये के 9,899 औद्योगिक निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिनके जरिए राज्य में 6,16,436 नए रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि स्कूल शिक्षा विभाग में 16,316, गृह विभाग में 14,723, बिजली विभाग में 8,706, स्थानीय निकाय विभाग में 5,681 और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में 4,758 नियुक्तियां की गई हैं।

धालीवाल ने कहा कि पहले पंजाब में सरकारी नौकरियां सिफारिश, राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार का शिकार थीं, जिससे योग्य युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठ चुका था। लेकिन मौजूदा सरकार ने पारदर्शी परीक्षाओं और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया के जरिए इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है।

उन्होंने कहा कि अब युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए किसी सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि उन्हें उनकी योग्यता और मेहनत के आधार पर अवसर मिल रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि केवल सरकारी नौकरियों से बेरोजगारी की समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसलिए राज्य सरकार ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और नीतिगत स्थिरता के माध्यम से औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने पर भी विशेष ध्यान दिया है।

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स्वास्थ्य योजना की सफलता तभी है, जब ज़रूरत के समय लोगों तक उपचार पहुँच सके : डॉ. बलबीर सिंह

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किसी भी स्वास्थ्य योजना की वास्तविक सफलता केवल इस बात से नहीं आँकी जा सकती कि उस पर कितना ख़र्च हुआ या कितने मामलों का निपटारा हुआ, बल्कि इस बात से तय होती है कि ज़रूरत के समय लोगों को समय पर उपचार मिल पाया या नहीं। भगवंत मान सरकार की मुख्यमंत्री सेहत योजना (एमएमएसवाई) के तहत 8 जनवरी 2026 से अब तक 2,91,417 लाभार्थियों को उपचार का लाभ मिल चुका है, जो कि एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

स्टेट हेल्थ एजेंसी (एसएचए), पंजाब के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत अब तक लगभग ₹1,044 करोड़ मूल्य की कैशलेस स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान की जा चुकी हैं। इन आंकड़ों के पीछे हज़ारों ऐसे परिवार हैं, जिन्हें चिकित्सा आपात स्थिति के दौरान इलाज के ख़र्च की चिंता किए बिना अपने प्रियजनों के स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिला।

इस उपलब्धि पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने कहा, “किसी भी स्वास्थ्य योजना की सफलता तभी मानी जाती है, जब वह ज़रूरत के समय लोगों तक पहुँचे। मुख्यमंत्री सेहत योजना केवल आंकड़ों की योजना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का माध्यम है कि किसी भी मरीज़ को इलाज और आर्थिक बोझ के बीच चुनाव न करना पड़े। प्रत्येक लाभार्थी उस परिवार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे कठिन समय में इस योजना का सहारा मिला।”

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री ने आगे कहा, “हम जानते हैं कि स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएँ लगातार बदल रही हैं और हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम स्वास्थ्य व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाते रहें। मुख्यमंत्री सेहत योजना के माध्यम से हम कैशलेस उपचार को अधिक सुलभ बना रहे हैं, स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत कर रहे हैं तथा यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि प्रत्येक पात्र नागरिक तक इस योजना का लाभ पहुँचे।”

मुख्यमंत्री सेहत योजना से लाभान्वित अनेक लोगों ने इस योजना के प्रति संतोष और प्रसन्नता व्यक्त की है। सुरेशपाल कौर ने बताया कि कठिन गर्भावस्था के दौरान मुख्यमंत्री सेहत योजना उनके परिवार के लिए संबल बनी। उन्होंने कहा, “गर्भावस्था के दौरान मुझे हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो गई थी और सीज़ेरियन डिलीवरी करवाने की ज़रूरत थी। ऐसे समय में सेहत कार्ड हमारे लिए बहुत बड़ी मदद साबित हुआ। जन्म के बाद मेरे बच्चे को विशेष नवजात चिकित्सा (नीओनेटल केयर) की आवश्यकता थी, जिसका पूरा उपचार भी मुख्यमंत्री सेहत योजना के पैकेज के तहत उपलब्ध करवाया गया। इस योजना ने कठिन समय में हमारा साथ दिया और मेरे बच्चे को जीवन की स्वस्थ शुरुआत मिली।”

सुनाम की रूपिंदर कौर ने बताया कि कई वर्षों से घुटनों के असहनीय दर्द के कारण उनका दैनिक जीवन प्रभावित हो गया था। उन्होंने कहा, “मैं लंबे समय से घुटनों के गंभीर दर्द से पीड़ित थी, लेकिन ख़र्च की चिंता के कारण ऑपरेशन के बारे में सोच पाना भी मुश्किल था। मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत मेरा घुटना प्रत्यारोपण (नी रिप्लेसमेंट) नि:शुल्क हुआ। इस उपचार ने मुझे फिर से सामान्य और बेहतर जीवन जीने का अवसर दिया है।”

इसी प्रकार तरनतारन के बीर सिंह को हृदय संबंधी बीमारी का पता चलने पर मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत समय पर उपचार मिला। उनका एंजियोग्राफी के साथ पीटीसीए (परक्यूटेनियस ट्रांसल्यूमिनल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी) किया गया।

बीर सिंह ने कहा, “डॉक्टरों ने बताया कि हृदय रोग के उपचार में देरी नहीं की जा सकती और इसका ख़र्च परिवार के लिए बहुत बड़ा बोझ बन सकता है। मुख्यमंत्री सेहत योजना के कारण मुझे समय पर आवश्यक उपचार मिल गया।”

मुख्यमंत्री सेहत योजना का प्रभाव अब पूरे पंजाब में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। राज्य के प्रत्येक ज़िले के लाभार्थी इस योजना के तहत उपचार प्राप्त कर रहे हैं। स्टेट हेल्थ एजेंसी (एसएचए), पंजाब के ज़िला-वार आंकड़ों के अनुसार अब तक 2,91,417 लोगों को योजना का लाभ मिल चुका है। ज़िलों में पटियाला 27,892 लाभार्थियों के साथ पहले स्थान पर है। इसके बाद बठिंडा में 22,584 तथा लुधियाना में 21,729 लाभार्थियों ने योजना का लाभ प्राप्त किया है। यह दर्शाता है कि सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पंजाब में इसकी व्यापक माँग है।

योजना के अंतर्गत जालंधर (19,312), होशियारपुर (19,075), अमृतसर (16,550), संगरूर (16,549), श्री मुक्तसर साहिब (14,800), फिरोज़पुर (13,344) तथा गुरदासपुर (12,037) में भी बड़ी संख्या में लोगों ने लाभ प्राप्त किया है। इसके अतिरिक्त मोगा (11,669), फाज़िल्का (11,516), मानसा (10,539), फरीदकोट (10,309), बरनाला (8,773), तरनतारन (8,714), रूपनगर (8,574), एस.ए.एस. नगर (8,085), फतेहगढ़ साहिब (7,933), शहीद भगत सिंह नगर (6,999), कपूरथला (5,928), पठानकोट (5,844) तथा मालेरकोटला (2,472) के लाभार्थियों ने भी कैशलेस उपचार प्राप्त किया है। यह व्यापक पहुँच इस बात का प्रमाण है कि मुख्यमंत्री सेहत योजना केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों सहित प्रदेश के सभी ज़िलों में परिवारों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहुँचा रही है।

मुख्यमंत्री सेहत योजना का लगातार बढ़ता दायरा स्वास्थ्य सेवाओं में एक सरल लेकिन महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। अब लोगों को उपचार शुरू करवाने से पहले यह चिंता नहीं सताती कि वे इसका ख़र्च कैसे उठाएँगे। योजना का विस्तार लगातार जारी है और इसका उद्देश्य स्पष्ट है—पंजाब के प्रत्येक नागरिक को गुणवत्तापूर्ण, सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करवाना।

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ई-20 पेट्रोल से वाहनों के नुकसान का मुद्दा पंजाब विधानसभा में गूंजा

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने आज पंजाब विधानसभा में ई-20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल का मुद्दा उठाते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने संसद में यह मानने के बावजूद कि ई-20 से वाहनों की माइलेज घटती है, इसे जबरदस्ती थोपा है। उन्होंने कहा कि इस कदम से वाहन मालिकों पर वित्तीय बोझ पड़ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि इसे लागू करने में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई है और आरोप लगाया कि इसका मकसद अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते के हितों की पूर्ति करना है, जिसके तहत भारत अगले पाँच सालों में 20 अरब डॉलर का इथेनॉल आयात करेगा। इस बात पर जोर देते हुए कि उपभोक्ताओं को चुनाव के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, पंजाब विधानसभा ने केंद्र सरकार से फ्यूल स्टेशनों पर शुद्ध पेट्रोल और ई-20 दोनों उपलब्ध कराने और आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए ई-20 की कीमत घटाने की मांग करता हुआ एक प्रस्ताव पारित किया।

अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “पंजाब विधानसभा सत्र के दौरान, मैंने उपभोक्ताओं पर ई-20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल थोपे जाने और इससे लोगों के वाहनों को हो रहे नुकसान का गंभीर मुद्दा उठाया। यह तेल केंद्र सरकार द्वारा बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के थोपा गया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, इससे 67 फीसदी वाहनों की माइलेज घटी है, जबकि 45 फीसदी वाहनों के इंजन खराब हुए हैं, जिससे आम लोगों पर सीधा वित्तीय बोझ पड़ा है।”

उन्होंने पोस्ट के अंत में लिखा, “केंद्र सरकार ने स्वयं संसद में माना है कि ई-20 पेट्रोल वाहनों की माइलेज घटाता है। यह सब अमेरिका के साथ हुए एक बड़े व्यापार समझौते के हितों की पूर्ति करने और कॉरपोरेट कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए किया जा रहा है। हमारी मांग है कि फ्यूल स्टेशनों पर उपभोक्ताओं को शुद्ध पेट्रोल और ई-20 के बीच चयन करने का अधिकार दिया जाए और ई-20 की कीमत तुरंत घटाई जाए। पंजाब विधानसभा ने आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए इस मुद्दे पर प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया है। इंकलाब जिंदाबाद।”

विधानसभा में इस मुद्दे पर बहस को समेटते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “यह देश के हर नागरिक के लिए गंभीर चिंता का विषय है। ई-20 इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल बिना किसी उचित शोध, वैज्ञानिक अध्ययन या सलाह-मशवरे के वाहन मालिकों पर थोपा गया है। केंद्र सरकार ने यह साबित करने के लिए कोई अध्ययन नहीं किया और न ही किसी इंजीनियरिंग कॉलेज या आई.आई.टी. से प्रमाण-पत्र लिया है कि ई-20 पेट्रोल वाहनों के इंजनों के लिए सुरक्षित है।”

केंद्र पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “ई-10 पेट्रोल पर चलने के लिए डिज़ाइन किए गए इंजनों को व्यापक विरोध के बावजूद मनमाने ढंग से ई-20 पर तब्दील कर दिया गया। 45,000 से अधिक वाहनों के सर्वेक्षण के अनुसार, 67 फीसदी ने माइलेज में भारी गिरावट दर्ज की, जबकि 45 फीसदी इंजन खराब हो गए हैं। यह आम लोगों, जो सालों की बचत और किश्तों पर वाहन खरीदते हैं, की खून-पसीने की कमाई की खुली लूट के अलावा कुछ नहीं है।”

वाहन मालिकों पर पड़ रहे बोझ का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “पहले तो आम लोग बड़ी मुश्किल से वाहन खरीदते हैं और फिर उन्हें इस नीति के कारण मरम्मत का अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ता है। यह बहुत अफसोसजनक है कि केंद्र सरकार ई-20 के नाम पर लोगों को गुमराह कर रही है। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी यह मुद्दा उठाया है और दो लाख से अधिक हस्ताक्षर वाली जनता की याचिका तैयार की है, जो वे प्रधानमंत्री को सौंपने जा रहे हैं।”

केंद्र के अपने कबूलनामे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “शुरू में केंद्र सरकार ने दावा किया था कि सिर्फ वाहन निर्माता ही माइलेज का निर्धारण कर सकते हैं। लेकिन हर चालक अपने वाहन की माइलेज देख सकता है, जो आधुनिक वाहनों के डैशबोर्ड पर दिखाई देती है। केंद्र ने अब संसद में मान लिया है कि ई-20 पेट्रोल माइलेज को छह फीसदी तक घटा सकता है और यह वाहनों के इंजनों को प्रभावित करता है।”

इस नीति के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “यह सिर्फ इथेनॉल के बारे में नहीं, बल्कि इस संबंध में अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से है। इस समझौते के तहत भारत अगले पाँच सालों में इथेनॉल के आयात को पाँच गुना बढ़ाकर लगभग एक अरब लीटर से पाँच अरब लीटर करेगा, जो कि लगभग 20 अरब डॉलर बनता है। अमेरिका इथेनॉल का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है और भारत को यह बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डोनाल्ड ट्रंप के आगे झुकने और उनकी हर बात को स्वीकार करने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है? अमेरिकी किसान अपनी अतिरिक्त पैदावार का निपटारा कर रहे हैं, जबकि भारतीय उपभोक्ताओं को उसकी कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।”

केंद्र सरकार की विदेश नीति की निंदा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “केंद्र के फैसले बड़े कॉरपोरेट घरानों के हितों को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं। स्थिति अब यह बन चुकी है कि भारत को कहाँ से कच्चा तेल खरीदना है और कहाँ से नहीं, यह अमेरिका तय करता है। ऑपरेशन सिंधूर के दौरान भी, अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान से संबंधित विकास की घोषणा की थी, जिससे हमारी विदेश नीति पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।”

इसे लागू करने की समय-सीमा पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “केंद्र ने असल में 2030 तक ई-20 को लागू करने की योजना बनाई थी। 2026 में इसे लागू करने की क्या जल्दी थी? उन्होंने ई-20 से शुरुआत की है और ई-25 तथा ई-50 को लागू करने से पहले विवाद के ठंडा पड़ने का इंतज़ार कर रहे हैं।”

विधानसभा के रुख को उजागर करते हुए उन्होंने कहा, “पंजाब विधानसभा ने इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की है। भाजपा सदस्यों ने हिस्सा न लेने का फैसला किया, लेकिन हम लोगों के हितों की रक्षा के लिए इस लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। उपभोक्ताओं को शुद्ध पेट्रोल और ई-20 में से एक चुनने की छूट होनी चाहिए। पहले, लोग लैड और अनलेड पेट्रोल में से एक चुन सकते थे। यह फैसला लोगों की मर्जी को ताक पर रखकर जबरन उन पर थोपा गया है।”

इस नीति की तुलना टोल प्लाज़ा से करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “दुनिया भर में, लोगों के पास टोल सड़कों या बिना टोल वाली सड़कों का चयन करने का विकल्प होता है। जब नागरिक पहले ही रोड टैक्स अदा करते हैं, तो उन्हें अलग से टोल टैक्स क्यों देना पड़े? पंजाब सरकार ने 19 टोल प्लाज़ा बंद कर दिए हैं, जिससे यात्रियों को हर रोज़ लगभग 67 लाख रुपये की बचत हो रही है।”

अपनी मांग को दोहराते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “लोगों को तुरंत पेट्रोल पंपों पर शुद्ध पेट्रोल और ई-20 में से एक चुनने की छूट दी जानी चाहिए और ई-20 की कीमत घटाई जानी चाहिए। मैंने प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय और अन्य संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर उनसे आम लोगों के हितों की रक्षा करने की अपील की है।”

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